बिहार के गयाजी में पितृ पक्ष मेले के अवसर पर एक अनूठी मानवीय पहल देखने को मिलती है, जहां चंदन कुमार सिंह उन तमाम अनाथ और अज्ञात लोगों के लिए अनुष्ठान करते हैं जिन्हें कोई याद रखने वाला नहीं है। फल्गु नदी के तट पर स्थित देव घाट पर वे अपने साथ एक डायरी लेकर पहुंचते हैं, जिसमें उन व्यक्तियों का विवरण दर्ज होता है जो या तो लावारिस पाए गए थे या जिनकी पहचान कभी सामने नहीं आ सकी। अपने पिता को दिए गए एक पुराने वचन को निभाते हुए वे पूरी निष्ठा से इन दिवंगत आत्माओं का तर्पण और पिंडदान संपन्न करते हैं।
पिता से मिली प्रेरणा और परंपरा
चंदन सिंह का यह सफर वर्ष 2014 में शुरू हुआ था, जब उन्होंने अपने दिवंगत पिता सुरेश नारायण सिंह की इच्छा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया था। उनके पिता वर्ष 2001 के गुजरात भूकंप के दौरान लावारिस और बेसहारा लोगों की स्थिति देखकर बेहद व्यथित हुए थे। इसके बाद उन्होंने उन लोगों के लिए अनुष्ठान करना शुरू कर दिया था जिनका कोई परिवार नहीं था या जिनके रिश्तेदार गरीबी अथवा शारीरिक अक्षमता के कारण गयाजी आने में असमर्थ थे। वर्ष 2013 में देव घाट पर तर्पण करते समय उनके पिता ने चंदन से इस कार्य को निरंतर जारी रखने का वचन लिया था, जिसे वे आज तक पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं।
डायरी में दर्ज होते हैं भूले-बिसरे नाम
सालभर विभिन्न माध्यमों से जानकारी इकट्ठा कर चंदन उन लोगों के विवरण अपनी डायरी में नोट करते हैं जो दुनिया से अकेले रुखसत हो गए। चाहे वह किसी अज्ञात शव के अंतिम संस्कार की जानकारी हो या फिर किसी आपदा में जान गंवाने वाले लोग, वे किसी को भी भुलाना नहीं चाहते। इस वर्ष वे नेपाल की बाढ़ में प्रभावित हुए लोगों के लिए भी तर्पण करने की योजना बना रहे हैं, ताकि उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जा सके।
अज्ञात आत्माओं के लिए धार्मिक विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का गोत्र या नाम ज्ञात न हो, तो भी विशेष विधियों के माध्यम से उनका कर्मकांड किया जा सकता है। स्थानीय पुरोहितों के अनुसार, ऐसे मामलों में ‘ज्ञात-अज्ञात’ रूप में ईश्वर का आह्वान कर प्रतीक स्वरूप नामों का उपयोग किया जाता है। चंदन का मानना है कि शोक और दिवंगत प्रियजनों को याद करने की भावना हर मनुष्य में समान होती है, और यही विश्वास उन्हें इस नेक काम को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।

