जलवायु-नीतियों और आर्थिक असमानता के बीच एक गहरा विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जहां एक ओर लोग ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए सरकारी कदम चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक असुरक्षा के कारण बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में जनता का रुख बदल रहा है। यह स्थिति पिछले चार दशकों की असफल नीतियों और गहरी आर्थिक विषमता से उपजी है, जिसके चलते आम नागरिकों में सरकारों के प्रति अविश्वास गहरा होता गया है।
आर्थिक असुरक्षा और जनता का असंतोष
हाल ही में कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि एक तरफ जहां बेहद अमीर लोगों की संपत्ति में भारी इजाफा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी होने की चिंता सता रही है। कम आय वाले देशों में यह असुरक्षा और भी अधिक गंभीर है। सर्वे में शामिल अधिकांश लोगों का मानना था कि उनके देशों में आर्थिक असमानता बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और मौजूदा व्यवस्था मुख्य रूप से धनी तथा प्रभावशाली लोगों को ही लाभ पहुँचाने के लिए काम कर रही है।
जलवायु कार्रवाई और सामाजिक विभाजन
सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश लोग ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कड़े सरकारी कदमों का समर्थन करते हैं, भले ही इसके कारण कीमतों में वृद्धि क्यों न हो जाए। हालांकि, निम्न-आय वर्ग और दक्षिणपंथी झुकाव वाले लोगों में इस समर्थन में कमी आई है। जानकारों का मानना है कि यदि जलवायु नीतियां केवल आम आदमी पर बोझ डालें और शीर्ष स्तर के अमीरों को राहत देती रहें, तो इन्हें व्यापक सामाजिक समर्थन मिलना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, समाज में बढ़ती दूरियां और राजनीतिक विभाजन भी दीर्घकालिक और सामूहिक फैसले लेने की प्रक्रिया को काफी जटिल बना देते हैं।

