गोवा में आर्थिक समृद्धि के बीच गरीबी और लाचारी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया है। परनेम के कासरवर्ने इलाके में रहने वाले 65 वर्षीय अशोक की गंभीर बीमारी के बाद मौत हो गई, जिसके बाद उनके परिवार को अंतिम विदाई के लिए भी भारी संघर्ष करना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि किस प्रकार संसाधनहीन लोग सम्मानजनक विदाई के अभाव में जीने और मरने को मजबूर हैं।
अशोक का संघर्षपूर्ण जीवन और असमय निधन
अशोक कभी एक होटल में छोटे-मोटे काम करते थे, लेकिन दो साल पहले एक पैर कट जाने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह सिमट गई थी। वे अपनी दो विधवा बहनों के सहारे जीवन गुजार रहे थे, जो सरकारी मदद पर निर्भर थीं। जब 13 सितंबर को अशोक की तबियत बिगड़ी, तो उन्हें एंबुलेंस से हेल्थ सेंटर ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
लकड़ी खरीदने के पैसे न होने पर उठानी पड़ी मजबूरी
परिवार को उम्मीद थी कि नगरपालिका के श्मशान घाट पर मुफ्त अंतिम संस्कार की सुविधा मिल जाएगी। जब वे शव को वहां लेकर पहुंचे, तो न तो कोई अटेंडेंट मिला और न ही उनके पास दाह संस्कार के लिए लकड़ी खरीदने के पैसे थे। वाहन का किराया और अन्य खर्च उठाने में असमर्थ दोनों बहनों को रात के वक्त मजबूरन भाई का शव वहीं छोड़कर घर लौटना पड़ा।
पुलिस जांच और बाद में हुआ अंतिम संस्कार
अगली सुबह श्मशान घाट पर शव मिलने के बाद पुलिस ने मामले की छानबीन शुरू की और सब-इंस्पेक्टर आदित्य गड की तलाश के जरिए परिवार की पहचान हुई। इसके बाद रिश्तेदारों ने आपसी सहयोग से पैसे जुटाकर लकड़ी की व्यवस्था की और अंततः अशोक का अंतिम संस्कार संपन्न हो सका। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि किसी भी समाज की सच्ची प्रगति का आकलन उसके सबसे कमजोर व्यक्ति की स्थिति से ही किया जा सकता है।

