उद्योगों को स्वच्छ और हरित तकनीक की ओर स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त वित्तीय निवेश, सरकारी प्रोत्साहन और निजी क्षेत्र की भागीदारी बेहद आवश्यक है। आईआईटी-आईएसएम धनबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के वित्त प्रोफेसर तपन कुमार सरकार ने यह बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास को केवल आर्थिक वृद्धि के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके साथ पर्यावरण और सामाजिक चिंताओं को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
पर्यावरण और औद्योगिक विकास में संतुलन
झारखंड जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर होने वाली खनन और औद्योगिक गतिविधियां रोजगार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती हैं, लेकिन इसके साथ प्रदूषण और पर्यावरणीय प्रभाव जैसी चुनौतियां भी पैदा होती हैं। भविष्य में उद्योगों को साफ-सुथरा और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्रदूषण कम करने वाली तकनीकों को अपनाकर औद्योगिक विकास को पर्यावरण जिम्मेदारी के साथ जोड़ना ही सतत विकास की कुंजी है।
वित्त पोषण और छोटे उद्योगों की भूमिका
प्रोफेसर सरकार के अनुसार, हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त वित्त पोषण की है। ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है, जिसमें अकेले सरकार के प्रयास नाकाफी हैं। बैंकिंग और निजी क्षेत्र को आगे आकर ग्रीन टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाना होगा। इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्यमों को तकनीकी बदलाव के लिए सीमित वित्तीय क्षमता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए सरकार को ऐसे उद्यमों के लिए विशेष सहायता और लक्षित प्रोत्साहन प्रदान करने चाहिए जो उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों को अपनाते हैं।
एआई और भारत की युवा शक्ति
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और रोजगार के संबंध में उन्होंने कहा कि एआई कुछ पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह नए रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा। इसलिए कार्यबल को बदलती तकनीक के लिए तैयार रहना होगा। भारत की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि देश की विशाल युवा और प्रतिभाशाली मानव संसाधन इसकी सबसे बड़ी ताकत है। कौशल विकास और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करके भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर सकता है।

