संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय अधिकारियों की भूमिका अक्सर चर्चा में रहती है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के स्थायी मिशन से जुड़े राजनयिकों के बयानों ने वैश्विक स्तर पर ध्यान खींचा है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर इन महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वाले अधिकारी किस प्रक्रिया के जरिए चुने जाते हैं और उनकी नियुक्ति कैसे होती है।
इंडियन फॉरेन सर्विस (IFS) का महत्व
भारतीय विदेश सेवा यानी आईएफएस देश की प्रमुख केंद्रीय और कूटनीतिक सेवाओं में से एक है। इसका मुख्य कार्य देश के बाहरी मामलों को संभालना है, जिसमें कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देना शामिल है। एक आईएफएस अधिकारी की जिम्मेदारी सरकार की विदेश नीति को बनाने और उसे सुचारू रूप से लागू करने की होती है। इसके अलावा, ये अधिकारी विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों के कामकाज की देखरेख भी करते हैं।
कैसे होता है चयन?
संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारी मुख्य रूप से भारतीय विदेश सेवा से आते हैं। आईएफएस अधिकारी बनने के लिए उम्मीदवारों को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा को पास करना अनिवार्य होता है। इस चयन प्रक्रिया में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों को आधार बनाया जाता है। परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवार अपनी वरीयता के आधार पर आईएफएस का चयन करते हैं और इसके बाद उन्हें विशेष प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है।
कहां होती है तैनाती?
प्रशिक्षण और चयन के पश्चात इन अधिकारियों की पोस्टिंग दुनिया भर में फैले लगभग 160 भारतीय दूतावासों और मिशनों में की जाती है। इसके अलावा इन्हें संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, विश्व बैंक और सार्क जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी भेजा जाता है। विदेश में राजनयिक जिम्मेदारियों के अलावा ये अधिकारी देश के भीतर पासपोर्ट और वीजा कार्यालयों जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी अपनी सेवाएं देते हैं।

