पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में इस साल दुर्गा पूजा की मूर्तियों के निर्माताओं के लिए उत्सव का यह समय चिंता का कारण बन गया है। ग्रामीण इलाकों में क्ले आर्टिसंस (मूर्तिकार) का कहना है कि पूजा समितियों द्वारा मूर्तियों की खरीदारी में देरी की जा रही है और दामों को लेकर अत्यधिक मोलभाव किया जा रहा है।
मूर्तिकारों को हो रहा है भारी नुकसान
ओल्ड मालदा ब्लॉक के छटियान मोर के एक मूर्तिकार विश्वनाथ पाल ने अपनी कार्यशाला में इस साल 11 मूर्तियां बनाई हैं, जिनमें से 4 मूर्तियां अभी तक नहीं बिकी हैं। खरीदारों के न आने के कारण उन्होंने मूर्तियों पर अंतिम परत का काम रोक दिया है। उनका कहना है कि पिछले साल जो मूर्ति 55 हजार से 60 हजार रुपये में बिकी थी, इस बार उसके लिए मात्र 25 हजार से 30 हजार रुपये तक ही मिल पा रहे हैं। कई समितियों ने अपना बजट घटाकर 20 हजार से 22 हजार रुपये कर दिया है, जबकि कच्चा माल और मजदूरी की लागत काफी बढ़ चुकी है।
सरकारी अनुदान को लेकर अनिश्चितता
बुलबुलचंडी के अस्पताल पारा स्थित एक अन्य कार्यशाला के मालिक बिस्वजीत पाल ने इस सीजन में 29 मूर्तियां बनाई हैं। उनका मानना है कि राज्य सरकार की ओर से पूजा समितियों को मिलने वाले अनुदान को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने के कारण आयोजकों के बजट पर असर पड़ा है। कई समितियों को यह नहीं पता कि उन्हें कितनी राशि मिलेगी, जिसके चलते वे सस्ते विकल्पों की तलाश कर रहे हैं या बहुत कम दामों पर मूर्तियां खरीदने का दबाव बना रहे हैं।
परिवार का भरण-पोषण बना चुनौती
मूर्तिकारों का कहना है कि वे इस पुश्तैनी काम के अलावा कोई अन्य व्यवसाय नहीं जानते हैं। सामग्री की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन ग्राहकों द्वारा आधी कीमत ही ऑफर की जा रही है। बुलबुलचंडी के ही एक अन्य बुजुर्ग मूर्तिकार उत्तम कुमार पाल ने बताया कि उन्होंने इस साल 30 मूर्तियां बनाई हैं जिनमें से 3 अभी भी बिना बिके रखी हैं। यदि ये मूर्तियां नहीं बिकती हैं, तो उन्हें लगभग डेढ़ लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है। स्थानीय कारीगरों का यह भी कहना है कि मूर्तिकारों की आजीविका और उनकी समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

