देश के विभिन्न न्यायाधिकरणों, विशेष तौर पर ऋण वसूली अपीलीय संस्थाओं में खाली पड़े पदों का पूरा विवरण देने के लिए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को 25 सितंबर की समयसीमा तय की है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि यह विषय सीधे तौर पर सामान्य नागरिकों के सुलभ न्याय पाने के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
कार्यों के संचालन पर मंडराता संकट
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की विशेष न्यायपीठ उन याचिकाओं पर विचार कर रही थी जिनमें यह आशंका व्यक्त की गई थी कि सदस्यों और पीठासीन अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने से कई महत्वपूर्ण संस्थान ठप हो सकते हैं। पीठ ने यह भी माना कि यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं की जाती हैं, तो पर्यावरण और वित्त से जुड़े मामलों के पीड़ितों को भारी कानूनी संकट का सामना करना पड़ेगा।
सरकार और चयन समिति का पक्ष
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कुछ ऋण वसूली अपीलीय संस्थाओं को अपने रोजमर्रा के कामकाज में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसके मद्देनजर, पीठ ने सरकारी वकील अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को निर्देश दिया कि वे निर्धारित तारीख तक खाली पदों की विस्तृत सूची अदालत के पटल पर रखें। सरकारी पक्ष ने अदालत को अवगत कराया कि कुल रिक्तियों का आंकड़ा लगभग नब्बे के करीब है और चयन समिति इनमें से इक्यासी पदों की प्रक्रिया पर गंभीरता से जुटी हुई है।
पर्यावरण मामलों पर अंतरिम राहत
इसके अलावा, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के तीन सदस्यों (दो न्यायिक और एक तकनीकी सदस्य) के सेवानिवृत्त होने के कारण पर्यावरण संबंधी मुकदमों पर पड़ने वाले असर का भी संज्ञान लिया गया। न्याय के हित को सर्वोपरि रखते हुए पीठ ने एक अस्थायी व्यवस्था के तहत इन तीनों सदस्यों का कार्यकाल तब तक बढ़ा दिया है जब तक कि नियमित पदों पर नई नियुक्तियां संपन्न नहीं हो जातीं।

