जब भी जीवन में लोकप्रियता बढ़ती है और लोग तारीफ करने लगते हैं, तो शब्दों का दायरा भी बड़ा हो जाता है। बिना सोचे-समझे मिलने वाली प्रशंसा व्यक्ति के भीतर अहंकार को जन्म दे सकती है, जिससे तारीफ अंततः एक दुर्गुण में बदल जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रशंसा मिलने पर उसे तुरंत स्वीकार करने के बजाय उस पर रोक लगाई जाए।
प्रशंसा पर स्व-मूल्यांकन का टोल टैक्स
जिस प्रकार किसी मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए टोल टैक्स चुकाना पड़ता है, उसी प्रकार जब जीवन में प्रशंसा आए तो उसे रोककर उसका भुगतान मांगना चाहिए। इस भुगतान का अर्थ है स्व-मूल्यांकन या खुद का सही आकलन करना। बिना अपने गुणों और सीमाओं को परखे किसी की कही हुई बातों को अपने भीतर पूरी तरह उतार लेना सही नहीं माना गया है।
ऐतिहासिक उदाहरण और सीख
इस बात को समझने के लिए एक प्राचीन प्रसंग का उल्लेख मिलता है, जिसमें राजा दशरथ ने अपनी सभा में इसका एक अनूठा प्रयोग किया था। रामचरितमानस के अयोध्याकांड के आरंभ में जब भरी सभा में उनकी प्रशंसा हो रही थी, तब उन्होंने दर्पण यानी आईना देखा था। सार्वजनिक रूप से दर्पण देखने का सामान्य प्रचलन नहीं होता, लेकिन उन्होंने ऐसा करके यह दर्शाया कि जब उनकी जय-जयकार हो रही थी, तब उन्होंने शीशे में अपना मूल्यांकन किया।
निष्कर्ष
जीवन में जब भी सराहना या तारीफ के शब्द सुनने को मिलें, तो व्यक्ति को आत्म-विश्लेषण जरूर करना चाहिए। यह अभ्यास व्यक्ति को जमीन से जोड़े रखता है और लोकप्रियता के कारण उत्पन्न होने वाले अहंकार से दूर रहने में मदद करता है।

