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निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा और मुआवजा तंत्र पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और हरियाणा से मांगा जवाब

निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा और मुआवजा तंत्र पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और हरियाणा से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने निर्माण और अन्य संबंधित गतिविधियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को तय करने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और हरियाणा सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। यह याचिका निर्माण श्रमिकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों को उठाने के लिए दाखिल की गई थी।

गुरुग्राम दुर्घटना की जांच और मुआवजे की मांग

याचिका में मुख्य रूप से नौ मार्च को गुरुग्राम के सिधरावली इलाके में स्थित एक निर्माण स्थल पर हुई दुर्घटना का जिक्र किया गया है। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में मिट्टी का ढेर गिरने के कारण सात मजदूरों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे। याचिकाकर्ता की ओर से इस घटना की एक स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने की मांग की गई है। इसके साथ ही, दुर्घटना में जान गंवाने वाले और घायल होने वाले श्रमिकों तथा उनके परिवारों के लिए उचित मुआवजे और पुनर्वास लाभ उपलब्ध कराने का निर्देश देने का आग्रह भी अदालत से किया गया है।

कानून और सुरक्षा मानकों पर अदालत की चर्चा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों का कोड (ओएसएच), 2020 इस तरह के मुद्दों को पूरी तरह से संबोधित नहीं करता है। उनका यह भी कहना था कि आमतौर पर निर्माण स्थलों पर किसी दुर्घटना के बाद मजदूरों को मिलने वाले मुआवजे के निर्धारण के लिए कोई स्पष्ट तंत्र मौजूद नहीं है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि यह पूरी तरह से अनियोजित क्षेत्र नहीं है और इसके लिए मौजूदा कानूनों की जांच की जा सकती है तथा यदि कोई कमी या दोष है तो उसे सामने लाया जा सकता है।

जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच

अदालत में दायर याचिका के माध्यम से यह भी अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार को 2020 के कोड के तहत कार्यस्थलों के लिए उचित व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को घोषित करने का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा, गुरुग्राम वाली घटना की व्यापक जांच की मांग की गई है, जिसमें डेवलपर, उसके निदेशकों, प्रबंधन कर्मियों, परियोजना अधिकारियों, सुरक्षा अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदारों समेत अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की गहराई से जांच शामिल हो। अदालत के इस रुख से निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के मामलों में जवाबदेही तय होने की उम्मीद है।

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