सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है जिसमें दो हजार रुपये से अधिक के कुछ चुनिंदा यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। यह मामला देश में पिछले कई वर्षों से पूरी तरह से मुफ्त चल रहे डिजिटल भुगतानों के भविष्य से संबंधित है।
क्या है पूरा मामला और एमडीआर शुल्क का प्रावधान?
केंद्र सरकार की ओर से तय किए गए नए नियमों के अनुसार 15 अक्टूबर से यूपीआई के माध्यम से कारोबारियों को दो हजार रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत का शुल्क लागू किया गया है। हालांकि, 75 हजार रुपये या उससे अधिक के भुगतान के लिए इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है। इसके साथ ही आम नागरिकों के बीच होने वाले ‘पर्सन टू पर्सन’ यानी पी2पी लेनदेन को पूरी तरह से मुफ्त और सुरक्षित रखा गया है। इस पूरी व्यवस्था की वैधता पर सवाल उठाते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई है।
याचिका में उठाए गए मुख्य कानूनी सवाल
अदालत में दायर याचिका के अनुसार यह नया शुल्क बिना किसी पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श या पारदर्शिता के जल्दबाजी में लाया गया है। याचिका में ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007’ की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना किसी विधिवत प्रकाशित वैधानिक दस्तावेज के केवल प्रेस विज्ञप्ति या अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (एफएक्यू) के आधार पर शुल्क थोपना मनमाना हो सकता है। इसके अलावा, यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के बीच किए गए अंतर पर भी आपत्ति जताई गई है क्योंकि रुपे कार्ड पर बिना किसी मौद्रिक सीमा के मुफ्त सुविधा जारी रखी गई है।
इस महत्वपूर्ण मामले पर सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्तियों की पीठ द्वारा की जाएगी, जिस पर देश भर के डिजिटल पेमेंट उपयोगकर्ताओं और कारोबारियों की नजर टिकी हुई है।

