सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम कानूनी मामले की सुनवाई के दौरान यह बड़ा सवाल उठाया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) किस आधार पर लॉ कॉलेजों का नियमन कर सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह इस बात की पूरी तरह से पड़ताल करेगी कि क्या वास्तव में बीसीआई के पास इस प्रकार का अधिकार है या नहीं। अदालत का यह रुख इस बात पर केंद्रित है कि एक नियामक संस्था के रूप में बार काउंसिल की कानूनी भूमिका मुख्य रूप से तब प्रारंभ होती है जब किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से लाइसेंस मिल जाता है।
अदालत की पीठ का गठन और मौखिक टिप्पणियां
इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि मुख्य सवाल यही है कि क्या बीसीआई द्वारा लॉ कॉलेजों का नियमन किया जा सकता है। उनकी कानूनी भूमिका लाइसेंस मिलने के बाद शुरू होती है, इसलिए यह जांचना आवश्यक है कि क्या उनके पास विश्वविद्यालयों या लॉ कॉलेजों को नियंत्रित करने का अधिकार है अथवा नहीं।
प्रधान न्यायाधीश ने अपनी मौखिक टिप्पणी में यह भी सवाल किया कि कानूनी शिक्षा का नियमन करने के लिए बार काउंसिल एक विशेषज्ञ निकाय कैसे हो सकती है और वे कानूनी शिक्षा के बारे में क्या जानते हैं। अदालत ने यह माना कि शिक्षा क्षेत्र में कानून के जाने-माने विद्वान और शिक्षाविद मौजूद हैं। इसके तहत पाठ्यक्रम चार या पांच वर्ष का होना चाहिए जैसे सामान्य दिशा-निर्देश तो तय किए जा सकते हैं, लेकिन संस्थानों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रखा जा सकता।
याचिकाएं और आगे की प्रक्रिया
यह पूरा घटनाक्रम उन विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिनमें बीसीआई-पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट के कामकाज और उसी ट्रस्ट के माध्यम से लॉ कॉलेज खोले जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे। इन तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने संबंधित याचिकाओं पर औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही, अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है कि वह आगामी दो सप्ताह के भीतर अपना लिखित जवाब प्रस्तुत करे।
