सुप्रीम कोर्ट ने दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने के केंद्र सरकार के निर्णय पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस नई व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस पूरे प्रकरण को कानूनी से अधिक तकनीकी करार दिया है।
चार हफ्ते के भीतर जवाब देने का निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया है कि इस पेमेंट गेटवे का उपयोग करने वाले लगभग 96 प्रतिशत उपयोगकर्ता इस शुल्क के दायरे से बाहर हैं और पूरी तरह सुरक्षित हैं।
क्या है पूरा मामला और नया फ्रेमवर्क?
केंद्र सरकार ने हाल ही में यूपीआई के लिए एक नया ढांचा पेश किया है, जिसके अंतर्गत 2,000 रुपये से ज्यादा के चुनिंदा कमर्शियल या पर्सन-टू-मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का एमडीआर शुल्क तय किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम लोगों के बीच होने वाले ‘पर्सन-टू-पर्सन’ लेनदेन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राशि चाहे कितनी भी हो, व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाला धन ट्रांसफर पूरी तरह निःशुल्क रहेगा।
ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा अतिरिक्त बोझ
अधिकारियों के अनुसार, एमडीआर मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़ा एक शुल्क है, जिसे सीधे ग्राहकों से नहीं वसूला जाएगा। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि व्यापारी इस एमडीआर शुल्क का वित्तीय बोझ आम ग्राहकों पर न डालें। इसके अलावा, यूपीआई एप्लीकेशन प्रोवाइडर्स को भी किसी भी प्रकार की प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए शुल्क लगाने से सख्त रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

