उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का वक्त बचा है, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी सरगर्मी अभी से तेज होने लगी है। विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए नए मुद्दों की तलाश में जुटे हैं। हाल ही में हुई राजनीतिक घटनाओं को भुनाने के प्रयास भी शुरू हो चुके हैं, जिससे आने वाले समय में दलित मतदाताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं गर्म हो गई हैं।
दलित राजनीति और बहुजन समाज पार्टी का सफर
एक समय था जब उत्तर प्रदेश में दलित वर्ग की पहली पसंद कांग्रेस पार्टी हुआ करती थी, लेकिन लंबे समय से इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ जुड़ा रहा है। हालांकि, आंकड़ों पर नजर डालें तो बसपा का आधार अब कमजोर होता दिखाई दे रहा है। बसपा का प्रभाव मुख्य रूप से जाटव समुदाय में अधिक रहा है, जबकि गैर-जाटव दलितों में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा है। साल 2007 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा ने सत्ता हासिल की थी, तब बड़ी संख्या में जाटव और गैर-जाटव दलितों ने उसे समर्थन दिया था, लेकिन बाद के चुनावों में यह समर्थन प्रतिशत काफी घट गया।
भाजपा की बढ़ती पैठ और वोटों का बिखराव
समय के साथ दलित वोटों के समीकरण में बड़ा बदलाव आया है। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि बसपा के कमजोर होने का फायदा मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला है। जाटव और गैर-जाटव दोनों ही वर्गों में एनडीए का समर्थन पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। खासतौर पर गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा का समर्थन प्रतिशत काफी ऊपर गया है। इसके विपरीत, बसपा का कुल वोट शेयर जो कभी ऊंचाई पर था, वह लगातार कम हुआ है। इसी अवधि में भाजपा और अन्य प्रमुख दलों के वोट शेयर में भी महत्वपूर्ण बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कांग्रेस की स्थिति और भविष्य की चुनौतियां
फिलहाल दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस पार्टी का समर्थन काफी कम बना हुआ है और दोनों ही प्रमुख दलित समूहों में उसका वोट शेयर सीमित रहा है। इसके बावजूद, कांग्रेस पार्टी लगातार दलित समुदायों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने और पुराना आधार वापस पाने की कोशिशों में लगी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनाव में असली सवाल यह होगा कि क्या दलित वोटर अभी भी एक दल से दूसरे दल की तरफ स्थानांतरित हो सकते हैं और कौन-सा राजनीतिक गठबंधन इन्हें प्रभावी रूप से आकर्षित कर पाएगा।

