उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र में स्थित ग्लेशियरों के तेजी से पीछे खिसकने और पिघलने का एक गंभीर मामला सामने आया है। हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, इस क्षेत्र के हिमनद औसतन 23.23 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं, जबकि कुछ ग्लेशियर इससे भी अधिक रफ्तार से पिघल रहे हैं।
अध्ययन के मुख्य बिंदु और शोधकर्ता
यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (UPES) देहरादून और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने मिलकर यह शोध किया है। इस रिसर्च टीम में ज्योति कुमारी, गिरीश कोठियारी, अतुल कुमार पाटीदार और वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता शामिल थे। वैज्ञानिकों ने 1990 से 2024 की अवधि के दौरान के उपग्रह चित्रों, डिजिटल एस्केलेशन मॉडल और मैदानी सर्वे के आंकड़ों का विश्लेषण किया। उनके यह निष्कर्ष ‘डिस्कवर जियोसाइंस’ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।
खतलिंग ग्लेशियर की स्थिति सबसे चिंताजनक
शोध के अनुसार, टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित खतलिंग ग्लेशियर के पीछे खिसकने की रफ्तार सबसे अधिक लगभग 88 मीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई है। इसके अलावा, गंगोत्री ग्लेशियर 22 मीटर, पिंडारी ग्लेशियर 45.8 मीटर, मिलम ग्लेशियर 37.8 मीटर, सतोपंथ ग्लेशियर 6.5 मीटर और चोराबाड़ी ग्लेशियर औसतन 6.8 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हटा है।
पिघलने के अन्य कारण और मलबे का प्रभाव
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि केवल तापमान ही ग्लेशियरों के पिघलने का एकमात्र कारण नहीं है। ऊंचाई, ढलान, आकार, बर्फ की मोटाई और सतह पर जमा मलबा भी पिघलने की गति को निर्धारित करते हैं। जिन ग्लेशियरों की सतह पर चट्टानी मलबा जमा होता है, वह एक इंसुलेटिंग परत के रूप में काम करता है और बर्फ को गर्मी से बचाता है। इसके विपरीत, झीलों के पास समाप्त होने वाले ग्लेशियर अधिक तेजी से पिघलते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि दक्षिण की ओर मुख वाले ग्लेशियर उत्तर की ओर मुख वाले ग्लेशियरों की तुलना में अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।

