दुनियाभर के 27 देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़े 400 से अधिक भारतीय मूल के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और पूर्व छात्रों ने ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ नामक एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। इन विद्वानों ने सड़क पर होने वाले उपद्रवी विरोध प्रदर्शनों के जरिए देश के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिशों पर चिंता जताई है।
प्रमुख वैश्विक संस्थानों के शिक्षाविदों ने दी प्रतिक्रिया
यह बयान अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देशों में रहने वाले शिक्षाविदों द्वारा जारी किया गया है। हस्ताक्षर करने वाले लोग MIT, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, कोलंबिया और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े हुए हैं। बयान में कहा गया है कि पिछले सात दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने अपनी मजबूती का बार-बार परिचय दिया है और यहां की संस्थाओं ने प्रभावी ढंग से काम किया है।
संवैधानिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
हस्ताक्षरकर्ताओं ने चिंता जताई कि चुनाव के नतीजे मनमुताबिक न आने पर अक्सर चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं। उनका कहना है कि संसद या अदालतों के बजाय सड़क को प्राथमिकता देने और न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाली टिप्पणियां करने का चलन बढ़ रहा है। इसके अलावा, अदालतों में विचाराधीन मामलों के राजनीतिकरण से देश की शासन व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा किया जा रहा है।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों का स्मरण
बयान में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की चेतावनी का हवाला देते हुए कहा गया है कि नागरिकों को संवैधानिक तरीकों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहना चाहिए और क्रांति के उन तरीकों को त्यागना चाहिए जिन्हें ‘अराजकता का व्याकरण’ कहा गया है। शिक्षाविदों ने सभी सामाजिक और राजनीतिक समूहों से अनुरोध किया है कि वे अपनी चिंताओं का समाधान केवल संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक संवाद के दायरे में ही तलाशें।

