भारत के आदित्य-एल1 और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशनों ने सौर विस्फोटों के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। दोनों अंतरिक्ष अभियानों से प्राप्त आंकड़ों का पहली बार संयुक्त विश्लेषण किया गया है, जिससे अंतरिक्ष विज्ञान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। यह महत्वपूर्ण शोध ‘एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
कोरोनल मास इजेक्शन का अध्ययन
बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ एस्ट्रोफिजिक्स के विज्ञानियों ने आदित्य-एल1 के वीईएलसी पेलोड और प्रोबा-3 के एएसपीआईआईसीएस पेलोड से मिले डाटा का उपयोग करके कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) का गहराई से अध्ययन किया है। सीएमई वास्तव में सूर्य से निकलने वाले गर्म गैस और चुंबकीय पदार्थ के विशाल गुबार होते हैं। जब ये पृथ्वी की तरफ बढ़ते हैं, तो अंतरिक्ष के आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। इन दोनों अंतरिक्ष अभियानों के आंकड़ों के मेल से सीएमई की प्रक्रिया को और बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी।
दोनों अंतरिक्ष मिशनों की भूमिका
भारत के पहले सौर मिशन आदित्य-एल1 को 2023 में लॉन्च किया गया था, जो सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंज प्वाइंट 1 (एल-1) के पास की कक्षा में रहकर सूर्य का लगातार अध्ययन कर रहा है। एल-1 बिंदु पर स्थित होने के कारण उपग्रह को बिना किसी ग्रहण या बाधा के सूर्य पर लगातार नजर रखने में मदद मिलती है। इसका वीईएलसी उपकरण सूर्य के कोरोना से आने वाले प्रकाश के स्पेक्ट्रम का विश्लेषण करता है।
वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का प्रोबा-3 मिशन दिसंबर 2024 में लॉन्च किया गया था। इस मिशन में दो अंतरिक्षयान लगभग 150 मीटर की दूरी पर उड़ान भरते हैं, जिनमें से एक यान दूसरे पर छाया डालकर कृत्रिम सूर्यग्रहण की स्थिति उत्पन्न करता है। इसका एएसपीआईआईसीएस उपकरण इस दौरान सूर्य के कोरोना की तस्वीरें कैद करता है।
अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान में मदद
शोध के अनुसार, जुलाई से दिसंबर 2025 के दौरान दोनों उपकरणों ने मिलकर 14 और 16 सितंबर को हुए दो प्रमुख सौर विस्फोटों को एक साथ रिकॉर्ड किया। इन दोनों ही मामलों में आदित्य-एल1 ने विस्फोटों को उनके शुरुआती चरणों में ही देख लिया था। आदित्य-एल1 के उपकरण ने लगभग 20 लाख डिग्री तापमान वाली गैस के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई, जबकि प्रोबा-3 की तस्वीरों से विस्फोट के आकार, गति और द्रव्यमान को सटीक रूप से मापने में मदद मिली। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संयुक्त डेटा से अंतरिक्ष के मौसम के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने के साथ-साथ उपग्रहों और संचार प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने में भी खासी सहायता मिलेगी।

