अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित भारत की विशाल पनबिजली परियोजना इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जिसे चीन द्वारा तिब्बत में बनाए जा रहे मेगा डैम के रणनीतिक जवाब के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस परियोजना को लेकर स्थानीय जनजातियों और विभिन्न संगठनों में गहरी चिंताएं व्याप्त हैं और वे इसका विरोध कर रहे हैं।
परियोजना का दायरा और पृष्ठभूमि
एनएचपीसी के अनुसार, 11200 मेगावाट क्षमता वाली सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) सियांग क्षेत्र के तीन जिलों—अपर सियांग, सियांग और पूर्वी सियांग में विस्तृत होगी। इस महत्वपूर्ण परियोजना की परिकल्पना पहली बार वर्ष 1983 में की गई थी और साल 2008 में इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया था। चीन द्वारा तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाए जा रहे विशाल बांध के मुकाबले इस परियोजना को बाढ़ नियंत्रण और राष्ट्रीय जल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।
स्थानीय लोगों की मुख्य चिंताएं
नदी किनारे बसे आदी और गालो जैसे स्थानीय जनजातीय समुदायों का मानना है कि इस बांध के निर्माण से उनके पैतृक गांव और उपजाऊ धान के खेत जलमग्न हो सकते हैं। कई स्थानीय संगठनों और किसानों के मंच का अनुमान है कि इससे बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हो सकते हैं और उनकी पारंपरिक आजीविका खतरे में पड़ सकती है। इसके साथ ही, एंग्लो-अबोर युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक स्थल केकर मोयिंग के भी नष्ट होने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार का पक्ष और स्पष्टीकरण
राज्य के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में केवल प्री-फिजिबिलिटी सर्वे का काम प्रस्तावित है, जो किसी भी निर्माण कार्य की अनुमति नहीं बल्कि केवल तकनीकी व्यावहार्यता का शुरुआती आकलन है। सरकार का तर्क है कि यह परियोजना चीन के बांध की तुलना में अधिक जल भंडारण करने में सक्षम होगी और इससे मौसमी बाढ़ पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही, प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जनता की चिंताओं को पूरी गंभीरता से सुना जाएगा और किसी को भी बेसहारा नहीं छोड़ा जाएगा।

