बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र सहित चार राज्यों में हुए विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है और पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया है। संसद से सड़क तक एनडीए के खिलाफ मुखर नजर आने वाली कांग्रेस चुनावी मैदान में लगातार संघर्ष करती दिख रही है। विधान परिषद की 28 सीटों के इन चुनावों में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कई तरह के राजनीतिक और संगठनात्मक सवाल खड़े हो गए हैं।
कर्नाटक और महाराष्ट्र में हार के कारण
पार्टी के लिए कर्नाटक में मिली हार विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि वहां पार्टी सत्ता में है और हाल ही में विधानसभा उपचुनावों में भी उसे जीत मिली थी। वहीं दूसरी ओर, महाराष्ट्र में नागपुर की अपनी एक सीटिंग सीट पर कांग्रेस को अपने ही गठबंधन साथी एनसीपी-एसपी के बागी उम्मीदवार के मैदान में होने के कारण हार का मुंह देखना पड़ा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने यह मैदान समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ दिया था।
बिहार में नेतृत्व और संगठन पर उठे सवाल
बिहार में राजद से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय पार्टी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ। दरभंगा की एकमात्र सीटिंग सीट पर कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष को जन सुराज उम्मीदवार के हाथों हार मिली। इस पराजय के बाद पार्टी के भीतर नेताओं ने एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है। वरिष्ठ नेताओं और सांसदों ने टिकट वितरण प्रणाली तथा प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं और संगठन में व्यापक बदलाव की मांग की है।
नेतृत्व की अनिर्णय की स्थिति
विधान परिषद चुनाव में हार के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले नेताओं के मामलों पर अभी तक केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का मानना है कि केवल बैठकों तक सीमित रहने के बजाय जमीन स्तर पर संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस तरह की चुनावी असफलताओं से बचा जा सके।

