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डिजिटल बैंकिंग और कैशलेस अर्थव्यवस्था: क्या नकद लेनदेन के दौर में लौटना संभव है?

डिजिटल बैंकिंग और कैशलेस अर्थव्यवस्था: क्या नकद लेनदेन के दौर में लौटना संभव है?

वित्तीय क्षेत्र में डिजिटलीकरण के माध्यम से हमें कई सुविधाएं प्राप्त हुई हैं, जिससे ग्राहकों के खातों को मेंटेन करने, लेन-देन का हिसाब रखने और डिजिटल लेनदेन को सक्षम बनाने जैसे बैंकिंग कार्य काफी आसान हो गए हैं। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य डिजिटल ट्रांसफर के जरिए कम नकदी की जरूरत वाली प्रणाली की ओर बढ़ना और वित्तीय संस्थानों के कामकाज को सरल बनाना था। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर की सुविधा भी ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई, जिससे ग्राहकों को बैंक शाखाओं तक जाने की आवश्यकता कम पड़ी।

मोबाइल बैंकिंग और यूपीआई के आने से वित्तीय तंत्र में एक बड़ा बदलाव आया है। हालांकि, इस पूरी डिजिटल प्रक्रिया और टेक्नोलॉजी की अपनी एक लागत भी है, जिसे लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि इस खर्च को कौन वहन करे। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटलीकरण से मुद्रा नोट छापने की कम जरूरत पड़ी है और खातों को अपडेट रखने, पारदर्शिता बढ़ाने तथा रीयल-टाइम अपडेट में काफी बचत हुई है। इससे रिजर्व बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों को बड़ा आर्थिक लाभ मिला है।

व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर असर

मर्चेंट डिस्काउंट रेट और पॉइंट ऑफ सेल मशीनों की लागत को लेकर व्यापारियों में चिंताएं बढ़ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई दुकानदार इस खर्च का भुगतान करने से हिचकिचा रहे हैं और कुछ ने तो दो हजार रुपये से अधिक के भुगतान के लिए यूपीआई लेना बंद कर नकद मांगना शुरू कर दिया है। यदि यह लागत उपभोक्ताओं या दुकानदारों पर डाली जाती है, तो इससे डिजिटल भुगतान की सफलता प्रभावित हो सकती है और लोग फिर से नकदी की ओर रुख कर सकते हैं।

भविष्य की दिशा और समाधान

चूंकि डिजिटल प्रणाली से रिजर्व बैंक और बैंकों को बड़े पैमाने पर बचत हुई है और नोट छापने का खर्च कम हुआ है, इसलिए विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस व्यवस्था की लागत को बैंकों और आरबीआई को खुद वहन करना चाहिए। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने वाले प्रयासों को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि व्यापारियों और आम नागरिकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न डाला जाए, ताकि कैशलेस अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति बाधित न हो।

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