Site icon Memoirs Publishing

बदलते मौसम का असर: प्रशांत महासागर की इस घटना से देश में सर्दियों और खेती पर बढ़ेगी मुश्किलें

बदलते मौसम का असर: प्रशांत महासागर की इस घटना से देश में सर्दियों और खेती पर बढ़ेगी मुश्किलें

वैश्विक स्तर पर हो रहे तेजी से जलवायु बदलावों के बीच अल नीनो ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। भारत के लिए यह मौसमी बदलाव एक दोहरी चुनौती के रूप में सामने आया है, जहां मानसून के दौरान कम बारिश दर्ज किए जाने के बाद अब सर्दियों के मौसम और कृषि व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, इस मौसमी घटना का प्रभाव साल 2027 तक बना रह सकता है।

क्या है अल नीनो और इसका मौसम पर प्रभाव

अल नीनो एक ऐसी मौसमी प्रक्रिया है जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह घटना दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। भारत के संदर्भ में, इसके सक्रिय होने पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा काफी बढ़ जाता है क्योंकि यह भारतीय मानसून के अनुकूल मौसमी स्थितियों को कमजोर कर देता है।

भारत में बारिश का असमान वितरण और सूखा

बीते मानसूनी सीजन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश का असमान पैटर्न देखने को मिला। हालांकि मध्य भारत में लगभग सामान्य बारिश दर्ज की गई, लेकिन पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी आई जिसे सूखे जैसी स्थिति माना गया। इसके अलावा, दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई। इस स्थिति के चलते जल संसाधनों और कृषि पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

सर्दियों में तापमान बढ़ने की आशंका

दक्षिण एशिया के जलवायु अनुमानों के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान अधिकांश क्षेत्रों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। सर्दियों के अंतिम दौर में तापमान बढ़ने से विशेषकर गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है, यदि यह गर्मी फसल में दाने भरने के समय पड़ी। हालांकि, सर्दियों के वास्तविक हालात पश्चिमी विक्षोभ जैसे अन्य मौसमी कारकों पर भी निर्भर करेंगे।

वैश्विक स्तर पर तबाही और भारत के सामने चुनौतियां

अल नीनो का प्रकोप केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इंडोनेशिया में जंगलों की भयंकर आग, अफ्रीका और अमेजन के जंगलों में सूखे के हालात, तथा दक्षिण अमेरिका में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत के कृषि क्षेत्रों, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा के सामने बड़ी परीक्षा खड़ी हो गई है। जानकारों का मानना है कि किसानों के लिए समय पर उचित सलाह, कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों का बेहतर प्रबंधन करने से संभावित संकट से निपटा जा सकता है।

Exit mobile version