विदेशी अंशदान नियमन संशोधन विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति के प्रमुख संजय जायसवाल ने कहा है कि इस प्रस्तावित कानून के मुख्य प्रावधानों में वही धाराएं शामिल हैं जो UPA सरकार द्वारा वर्ष 2010 में बनाए गए कानून में थीं। यह बात उन्होंने समिति की बैठक के बाद सामने रखी, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने अपने विचार साझा किए।
कानून में संपत्ति जब्ती के प्रावधानों पर चर्चा
संजय जायसवाल ने संवाददाताओं को जानकारी दी कि वर्ष 2010 के कानून के तहत यदि किसी एनजीओ में अनियमितताएं पाई जाती थीं, तो राज्य के गृह सचिव या प्रमुख सचिव को एफसीआरए के तहत मिलने वाली विदेशी फंडिंग की संपत्ति जब्त करने का अधिकार दिया गया था। नए विधेयक में उसी व्यवस्था के स्थान पर एक नामित प्राधिकारी को यह अधिकार देने का प्रस्ताव रखा गया है।
विभिन्न संगठनों ने रखे अपने विचार
समिति की हालिया बैठक में कई प्रमुख धार्मिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिनमें रामकृष्ण मठ, इस्कॉन और साइरो मालाबार चर्च शामिल रहे। समिति अध्यक्ष ने बताया कि सभी पक्षों की बातों को ध्यान से सुना गया है और आने वाली बैठकों में इन सभी बिंदुओं पर विचार-विमर्श करके सामूहिक रूप से निर्णय लिए जाएंगे।
विपक्ष के आरोपों और सरकार का रुख
लोकसभा में इस विधेयक को मार्च में पेश किए जाने के बाद अगस्त में संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है और इसके प्रावधानों से एनजीओ का वित्तपोषण प्रभावित हो सकता है। हालांकि, सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यह कानून किसी विशेष धर्म से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना और उसका सही उपयोग सुनिश्चित करना है।

