राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पूरा जीवन देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा है। हर साल 2 अक्टूबर को मनाई जाने वाली गांधी जयंती उनके सत्य, अहिंसा और शांति के सिद्धांतों को याद करने का दिन है।
मोहनदास करमचंद गांधी का प्रारंभिक जीवन
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में पिता करमचंद गांधी और माता पुतलीबाई के घर हुआ था। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। महज 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कस्तूरबा गांधी के साथ हुआ। वकालत की शिक्षा पूरी करने के बाद वे कानून की प्रैक्टिस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए, जहां उन्होंने नस्लीय भेदभाव और रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग किया।
भारत वापसी और स्वतंत्रता आंदोलन
दक्षिण अफ्रीका से वर्ष 1915 में भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1917 के चंपारण सत्याग्रह का सफल नेतृत्व करने पर प्रख्यात साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए उन्होंने कई बड़े जन-आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें असहयोग आंदोलन (1920), दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) प्रमुख रूप से शामिल हैं।
बापू और राष्ट्रपिता की पदवी
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को सिंगापुर रेडियो से देश के नाम संदेश देते हुए पहली बार उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था। इसी संबोधन के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी को ‘बापू’ भी कहा, जिसके बाद से पूरा देश उन्हें आदर के साथ बापू कहकर पुकारने लगा। उनके जीवन का मूल दर्शन सत्य, अहिंसा और स्वराज पर आधारित था। इसके साथ ही उन्होंने खादी के प्रचार, स्वदेशी अपनाने, स्वच्छता और छुआछूत उन्मूलन पर भी विशेष बल दिया था।
अहिंसा का वैश्विक संदेश
उनके अहिंसक संघर्षों और जन-नेतृत्व के परिणामस्वरुप 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। हालांकि, 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी और उनके अंतिम शब्द ‘हे राम!’ थे। उनके महान योगदान और शांति के संदेश के सम्मान में संयुक्त राष्ट्र संघ प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाता है, ताकि उनके मूल्य संपूर्ण मानव जाति के लिए प्रेरणा बने रहें।

