मानव जीवन की यात्रा अक्सर मनचाही और अनचाही परिस्थितियों के बीच झूलती रहती है। आम तौर पर सुख को मनचाहा माना जाता है, जबकि दुख अनचाहे रूप में हमारे सामने आ जाता है। संतों और धार्मिक ग्रंथों में ऐसे मार्ग का जिक्र मिलता है, जिससे ऐसा सुख प्राप्त किया जा सके जिसके पीछे किसी प्रकार का दुख न आए। इस दिशा में प्राचीन ग्रंथों और महान संतों के विचारों में बहुत कुछ स्पष्ट किया गया है।
भक्ति सभी सुखों की खान
तुलसीदास जी द्वारा दिए गए सूत्रों के अनुसार, भक्ति को सभी सुखों का स्रोत या खान बताया गया है। प्रसंगों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब काकभुशुंडि जी ने राम जी से भक्ति मांगी, तो उन्हें यह उत्तर मिला कि उन्होंने सभी सुखों की खान मांग ली है और इस संसार में उनके समान अन्य कोई भाग्यशाली नहीं है। इसी आधार पर यह माना जाता है कि वे लोग अत्यंत भाग्यशाली होते हैं, जिनके जीवन में भक्ति का प्रवेश होता है।
भक्ति का सदुपयोग और मानवीय मनोविज्ञान
हालांकि जीवन में भक्ति का आ जाना एक बात है, लेकिन उसका सही उपयोग करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। कई बार लोग भक्ति मिलने के बाद भी उसका दुरुपयोग कर जाते हैं, जिसे दुर्भाग्यपूर्ण माना गया है। इसका एक प्रमुख उदाहरण पौराणिक पात्र रावण के रूप में देखा जाता है। रावण भगवान शिव का भक्त था और उसे शिवजी से भक्ति व वरदान भी प्राप्त हुए थे, परंतु वह उन प्राप्तियों का उचित सदुपयोग नहीं कर सका।
विजयदशमी के पावन अवसर पर यह केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं रहता, बल्कि यह मनुष्य के मनोविज्ञान से जुड़ जाता है। यह सोचना और समझना जरूरी हो जाता है कि यदि किसी को भक्ति प्राप्त हो भी जाए, तो भी लोग उसका सही उपयोग करने से चूक जाते हैं। परिणाम यह होता है कि सही मानसिकता और सदुपयोग के अभाव में कोई भी व्यक्ति गलत मार्ग पर जा सकता है। इसलिए जीवन में भक्ति के आगमन के साथ-साथ उसकी रक्षा और उसके सही उपयोग पर ध्यान देना मनुष्य के लिए आवश्यक माना गया है ताकि जीवन का सही अर्थ सार्थक हो सके।

