भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी सैन्य टकराव और उसके बाद होने वाली औपचारिक शांति वार्ता का सिलसिला अब पूरी तरह टूट चुका है। दोनों देशों के आपसी संबंधों में आए इस बड़े बदलाव को कूटनीतिक मोर्चे पर एक नए सामान्य (न्यू-नॉर्मल) के रूप में देखा जा रहा है।
ऐतिहासिक कूटनीति और असफल शांति प्रयास
दशकों तक यह परंपरा रही थी कि सैन्य तनाव के बाद दोनों देश औपचारिक बातचीत की टेबल पर लौट आते थे, लेकिन वर्ष 2016 के बाद से उच्चस्तरीय वार्ताओं का यह दौर थम गया है। इतिहास पर नजर डालें तो 1947, 1965 और 1971 के पारंपरिक युद्धों के बाद पाकिस्तान ने एक नई रणनीति अपनाई, जो आतंकवाद के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। भारत की तरफ से शांति की हर पहल के जवाब में सीमा पार से उकसावे की कार्रवाई या आतंकी हमले देखने को मिले। वर्ष 1999 की लाहौर बस यात्रा के दौरान कारगिल घुसपैठ और वर्ष 2008 के मुंबई हमलों ने यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान की असैन्य सरकारों के पास वादों को पूरा करने की शक्ति का अभाव है, जबकि वहां की सैन्य व्यवस्था शांति को अपने वर्चस्व के लिए खतरा मानती है।
भारत की नीति में बुनियादी बदलाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में पुरानी कूटनीतिक परंपरा का पालन करते हुए शांति स्थापित करने के कई प्रयास किए थे, जिनमें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रण और लाहौर की यात्रा शामिल थी। हालांकि, पठानकोट हमले की जांच के दौरान आए असहयोगी रवैये और भारतीय क्षेत्र को बदनाम करने वाले निष्कर्षों के बाद भारत ने रणनीतिक संयम की नीति को त्याग दिया। इसके बाद से भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते हैं।
सैन्य सिद्धांत और भविष्य की दिशा
भारत ने पाकिस्तान के इस भ्रम को भी तोड़ दिया है कि उसका परमाणु हथियारों का जखीरा उसे किसी भी पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से सुरक्षित रखेगा। जब तक पड़ोसी देश अपनी सोच और प्राथमिकताओं में बुनियादी बदलाव नहीं लाता, तब तक दोनों राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक संवादहीनता और खामोशी का यह दौर ऐसे ही जारी रहने की संभावना है।

