भारतीय कृषि और किसान वर्ग के साथ शासन व्यवस्था के संबंधों में पिछले पच्चीस वर्षों के दौरान महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इस पूरी यात्रा की शुरुआत अक्टूबर 2001 में गुजरात से हुई थी, जिसने बाद में राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक रूप ले लिया। कृषि क्षेत्र में इस प्रगति को समझने के लिए बुनियादी ढांचे, जल प्रबंधन और तकनीकी सुधारों को अहम माना गया है।
गुजरात का कृषि विकास मॉडल
गुजरात में शुरुआती वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई थी। इस सफलता के पीछे किसी एक योजना के बजाय पूरे इकोसिस्टम का विकास था। खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए चेक डैम, खेत-तालाबों और नर्मदा नहर प्रणाली पर विशेष जोर दिया गया। इसके अलावा, ज्योतिग्राम योजना के जरिए कृषि फीडरों को अलग कर किसानों को भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की गई और ग्रामीण सड़कों के विकास से गांवों को बाजारों से जोड़ा गया।
राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं का विस्तार
जब यही दृष्टिकोण राष्ट्रीय फलक पर लागू हुआ, तो जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और सूक्ष्म सिंचाई जैसी पहलों को बढ़ावा मिला। जल संपत्तियों के निर्माण के साथ-साथ ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के सिद्धांत को भी प्राथमिकता दी गई। इसके अतिरिक्त, मोटे अनाजों यानी मिलेट्स को बढ़ावा देने के प्रयासों को भी व्यापक समर्थन मिला है।
प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता और सहकारिता
सरकार की तरफ से शुरू की गई पीएम-किसान योजना के माध्यम से किसानों के खातों में सीधी राशि स्थानांतरित की गई है, जिससे बिचौलियों के प्रभाव को कम करने में मदद मिली है। सहकारिता के क्षेत्र को मजबूत करने के लिए अलग से मंत्रालय का गठन किया गया है। इन तमाम नीतिगत कदमों और पहलों ने मिलकर देश में कृषि विकास की रूपरेखा को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है।

