अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि क्या भारत एक नरम राज्य या सॉफ्ट स्टेट रहा है। हालांकि, देश का इतिहास और तथ्य बताते हैं कि अपनी सीमाओं के बावजूद भारत ने हमेशा अपनी क्षमता से बढ़कर कड़े और प्रभावी कदम उठाए हैं।
गांधी की सोच और शुरुआती सैन्य फैसले
आधुनिक भारत की छवि पर भले ही महात्मा गांधी के विचारों की गहरी छाप रही हो, लेकिन देश की नीतियां पूरी तरह शांतिवादी नहीं रहीं। आजादी के तुरंत बाद जब कश्मीर में संकट उत्पन्न हुआ, तब महात्मा गांधी ने खुद ब्रिगेडियर लायनेल प्रोतीप सेन से स्पष्ट कहा था कि बेकसूर लोगों और उनकी संपत्तियों की रक्षा के लिए सभी उपलब्ध संसाधनों का पूरा इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायसंगत उद्देश्य के लिए सैन्य बल के प्रयोग से कभी परहेज नहीं किया गया।
विभिन्न प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में सख्त कदम
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 17 साल के लंबे कार्यकाल को अक्सर शांतिवादी माना जाता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। उनके शासनकाल के दौरान ही हैदराबाद में निजाम और रजाकारों की चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया गया, गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया और पाकिस्तान तथा चीन का मुकाबला किया गया। इसके अलावा, पूर्वोत्तर में नगा बगावत से निपटने के लिए सेना की तैनाती और अफस्पा (AFSPA) की शुरुआत भी नेहरू के समय ही हुई थी।
लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 के युद्ध में अपनी निर्णायक कार्रवाई से पाकिस्तान के मंसूबों को नाकाम कर दिया। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया और मिजो विद्रोहियों के खिलाफ वायुसेना का इस्तेमाल किया गया। मोरारजी देसाई के कार्यकाल में जैगुआर विमानों की खरीद हुई, जबकि राजीव गांधी ने श्रीलंका और मालदीव में सेना भेजकर भारत की सैन्य पहुंच को विदेशी धरती तक विस्तारित किया। रक्षा बजट और सैन्य साजो-सामान के मामले में भी उनके समय में बड़े फैसले लिए गए।
हालिया दौर और कड़े निर्णय
नब्बे के दशक में वीपी सिंह और नरसिंह राव की सरकारों ने आतंकवाद और आंतरिक बगावत से सख्ती से निपटा। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में पोकरण परमाणु परीक्षण और ऐतिहासिक परमाणु समझौते जैसे जोखिम भरे कदम उठाए गए। वर्तमान समय में सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और सशस्त्र माओवाद के खात्मे जैसे कदमों ने भारत के कड़े रुख को और अधिक मजबूती से दुनिया के सामने रखा है। इन तमाम ऐतिहासिक तथ्यों से यह साफ साबित होता है कि भारत कभी भी एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा है।

