भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और कई अन्य सेवानिवृत्त जजों ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की चुनाव आयोग पर की गई टिप्पणियों की तीखी आलोचना की है। पूर्व सीजेआई का मानना है कि न्यायिक मर्यादा का पालन करते हुए जजों को ऐसे मामलों पर सार्वजनिक रूप से बोलने से बचना चाहिए जो वर्तमान में अदालत में विचाराधीन हैं।
विचाराधीन मामलों पर सार्वजनिक बयानों पर आपत्ति
पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई ने एक समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा कि वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) से जुड़ा विवाद इस समय सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। ऐसी स्थिति में किसी भी मौजूदा जज को इस पर टिप्पणी करने की अनुमति न्यायिक मर्यादा नहीं देती है। दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी इस बयानबाजी को लेकर अपनी असहति जताई है और कहा है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस तरह के विचार व्यक्त करना उचित सीमाओं से आगे जाना है।
कानूनी दायरे और मतदान के अधिकार पर चर्चा
जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने मतदान के अधिकार पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि मताधिकार पूरी तरह से कानूनी ढांचे के नियमों पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि कोई भी नागरिक कानून के दायरे के आधार पर ही इस अधिकार को प्राप्त करता है। सेवानिवृत्त जजों का कहना है कि संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए ही ऐसे संवेदनशील विषयों पर निष्पक्ष और तर्कसंगत दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए।
जस्टिस भुइयां ने क्या कहा था?
यह पूरा घटनाक्रम जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के उस बयान के बाद सामने आया है, जो उन्होंने एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के दौरान दिया था। अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी कही जा सकती है। इसी बयान के बाद से न्यायपालिका के भीतर और बाहर इस पर बहस छिड़ गई है कि विचाराधीन मुद्दों पर सार्वजनिक मंचों पर क्या रुख अपनाया जाना चाहिए।

