कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया है कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के मानदंडों के अनुसार अनिवार्य स्नातकोत्तर योग्यता न रखने वाले व्याख्याता की सेवा समाप्ति पूरी तरह वैध है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी कर्मचारी के पास वैधानिक शैक्षणिक योग्यता का अभाव होने पर उसे कदाचार नहीं माना जा सकता, बल्कि यह पद के लिए पात्रता का विषय है।
अदालत ने ट्रिब्यूनल और एकल पीठ के आदेश को पलटा
न्यायमूर्ति डीके सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने राजीव एजुकेटेड ट्रस्ट द्वारा संचालित राजीव इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की अपील को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। खंडपीठ ने एजुकेशनल अपीलेट ट्रिब्यूनल और एकल पीठ के उन आदेशों को खारिज कर दिया, जिनमें व्याख्याता एमवी रमेश को वापस नौकरी पर रखने का निर्देश दिया गया था।
योग्यता और कदाचार में अंतर स्पष्ट
अदालत ने टिप्पणी की कि जब किसी कर्मचारी के खिलाफ कदाचार के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है, तब विभागीय जांच जरूरी होती है। लेकिन अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता न होने के मामले में सेवा से हटाने के लिए किसी विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं होती। न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालतें तकनीकी शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विशेषज्ञ निकायों द्वारा तय किए गए योग्यता मानदंडों को कमजोर नहीं कर सकती हैं।
चार साल तक सेवा में रखने पर मुआवजा देने का निर्देश
भले ही न्यायालय ने व्याख्याता की बर्खास्तगी को सही ठहराया, लेकिन कॉलेज प्रबंधन की जिम्मेदारी को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। संस्थान ने योग्यता न होने के बावजूद उन्हें चार साल तक पढ़ाने की अनुमति दी थी, जिससे उन्हें अपनी पात्रता का भ्रम हुआ। इसे ध्यान में रखते हुए, खंडपीठ ने प्रबंधन को चार सप्ताह के भीतर बारह लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह पूरा मामला हसन स्थित राजीव इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़ा है, जहां वर्ष 2011 में नियुक्ति के बाद संशोधित एआईसीटीई नियमों के तहत उच्च योग्यता प्राप्त न करने के कारण व्याख्याता को वर्ष 2015 में सेवामुक्त कर दिया गया था।

