माइन्स एंड मिनरल्स एक्ट 2026 के नए संशोधनों को लेकर देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। इस संशोधित कानून के तहत खनन पर केंद्रीय नियामक दायरे का विस्तार किया गया है, जिसके दायरे में माइन एंड मिनरल डेवलपमेंट के साथ खनिजयुक्त भूमि को भी शामिल किया गया है। नए प्रावधानों के तहत केंद्र द्वारा तय की गई शर्तों के अलावा राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिजयुक्त भूमि पर नए टैक्स लगाने से रोका गया है। इसके अलावा, इस कानून के लागू होने तक राज्यों द्वारा लगाए गए ऐसे मिनरल टैक्सों को भी रद्द किया गया है जिनकी वसूली पूरी नहीं हो सकी थी।
राजस्व निर्भरता और राज्यों के अलग-अलग रुख
झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों के गैर-कर राजस्व में खनिजों से होने वाली प्राप्तियों की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत तक है। वहीं, छत्तीसगढ़ में यह हिस्सेदारी 6 प्रतिशत और तेलंगाना में 11 प्रतिशत है। इसके अलावा कर्नाटक में 48 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 41 प्रतिशत और राजस्थान में 39 प्रतिशत गैर-कर राजस्व खनिजों से प्राप्त होता है। इसके बावजूद इन सभी राज्यों की प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल राजस्व-निर्भरता ही इस कानून के विरोध का इकलौता कारण नहीं है।
ओडिशा का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां अधिक खनिज राजस्व होने के बावजूद सत्ताधारी भाजपा सरकार और विपक्षी बीजद के रुख में अंतर देखा गया है। इसके विपरीत, तेलंगाना, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे राज्य इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क है कि खनिज अधिकारों व खनिजयुक्त भूमि पर कर लगाने की राज्य सरकार की क्षमता कम होने से उनकी वित्तीय शक्तियों और संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों को धक्का लगता है। केरल का यह भी कहना है कि इससे तटीय और वन क्षेत्रों में भी केंद्र के अधिकार बढ़ जाएंगे। झारखंड के मुख्यमंत्री ने भी आशंका जताई है कि राजस्व घटने से सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने अभी इस तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
संघीय व्यवस्था और प्रशासनिक मतभेद
भारत जैसी संघीय प्रणाली में केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद होना कोई नई बात नहीं है। संविधान द्वारा अधिकारों का बंटवारा होने के बावजूद, जब केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं, तो विधायी क्षेत्राधिकार, वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे विषयों पर टकराव सामने आते रहते हैं। जीएसटी मुआवजे, वित्त आयोगों के टर्म ऑफ रेफरेंस, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, नागरिकता संशोधन अधिनियम और अखिल भारतीय सेवा नियमों जैसे मामलों में भी केंद्र और राज्यों के बीच असंतोष देखा जा चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार, खनिजों पर निर्भरता का मामला भले ही आर्थिक हितों से जुड़ा हो, लेकिन यह पूरी तरह राजनीतिक तालमेल और समीकरणों पर भी निर्भर करता है कि कोई विशेष मुद्दा किस हद तक एक बड़ा संघीय विवाद बनेगा।

