सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अपने मक्का गठजोड़ यानी कथित मुस्लिम-नाटो को सक्रिय करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस रणनीतिक व्यवस्था के सामने आने के बाद से ही इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि कागज पर मजबूत दिखने वाला यह गठजोड़ वास्तविक धरातल पर कितना असरदार साबित होगा।
सैनिक ताकत और रणनीतिक सीमाएं
ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स में पाकिस्तान मजबूत स्थिति में है और उसके पास भारी संख्या में सक्रिय व रिजर्व सैनिक, फाइटर जेट तथा परमाणु हथियार मौजूद हैं। हालांकि, इसके बावजूद रणनीतिक गुंजाइश और उपयोग के मामले में कई बाधाएं सामने आती रही हैं। जानकारों के अनुसार इसके पीछे मुख्य रूप से राजनीति, प्राथमिकताएं और वित्तीय स्थिति जैसे तीन अहम कारण शामिल हैं।
ईरान से संबंध और आंतरिक सुरक्षा
पाकिस्तान ने क्षेत्रीय स्तर पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास किया है ताकि ईरान के साथ उसके कूटनीतिक और सामरिक संबंध बने रहें। ईरान के साथ लंबी सीमा होने के कारण ऊर्जा आपूर्ति और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे भी अहम हैं। इसके साथ ही, पाकिस्तान के सामने अफगानिस्तान सीमा से जुड़े तनाव, पूर्वी सीमा की स्थिति और देश के भीतर आतंकवाद जैसी गंभीर घरेलू चुनौतियां भी मौजूद हैं, जिनके कारण उसकी प्राथमिकताएं अलग हैं।
आर्थिक चुनौतियां और वित्तीय संकट
किसी अन्य देश के लिए युद्ध लड़ने में भारी खर्च होता है, जिसे पाकिस्तान की वर्तमान अर्थव्यवस्था वहन करने की स्थिति में नहीं है। देश की आर्थिक वृद्धि दर सीमित रहने, महंगाई दर अधिक होने और विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा कर्ज पर आधारित होने के कारण भारी सैन्य अभियानों का खर्च उठाना बेहद कठिन माना जा रहा है। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि इन तमाम सैन्य संसाधनों के बावजूद व्यावहारिक धरातल पर इस गठबंधन की सफलता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

