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भारत में बुनियादी ढांचे और योजनाओं के नामकरण की राजनीति और परंपरा

भारत में बुनियादी ढांचे और योजनाओं के नामकरण की राजनीति और परंपरा

भारत में हवाई अड्डों, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और कल्याणकारी योजनाओं के नाम राजनेताओं के नाम पर रखने की एक पुरानी परंपरा चली आ रही है। हालांकि, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस प्रथा के स्पष्ट विरोधी थे और उन्होंने जीवित रहते अपने नाम पर किसी भी सार्वजनिक संस्थान या बुनियादी ढांचे का नाम न रखे जाने की अपील की थी। इसके बावजूद उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी और उनके निधन के बाद कई परियोजनाओं का नामकरण उनके नाम पर किया गया।

नेहरू-गांधी परिवार और अन्य नेताओं से जुड़े नाम

आधिकारिक आरटीआई आंकड़ों के अनुसार, नेहरू-गांधी परिवार के तीन प्रधानमंत्रियों—जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी—के नाम पर देश भर में 450 से अधिक बड़ी योजनाएं, संस्थान और बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं दर्ज हैं। इनमें नई दिल्ली और हैदराबाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) जैसे बड़े संस्थान शामिल हैं। समय के साथ यह परंपरा अन्य गैर-नेहरू-गांधी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में भी देखी गई, जिसमें पी.वी. नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के नाम पर भी एक्सप्रेस-वे और विश्वविद्यालयों के नाम रखे गए।

मौजूदा दौर और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

हाल के वर्षों में अहमदाबाद के एक बड़े क्रिकेट स्टेडियम और नोएडा-जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर किए जाने से यह विषय फिर चर्चा में आया है। प्रधानमंत्री के रूप में अपने शुरुआती दौर में उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं में अपना नाम जोड़ने से इनकार किया था और ‘प्रधानमंत्री’ उपसर्ग के साथ योजनाएं शुरू की थीं। दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो ब्रिटेन में सार्वजनिक स्थानों या बुनियादी ढांचे का नाम राजनीतिक नेताओं के नाम पर नहीं रखा जाता है, जबकि अमेरिका में कुछ सीमित उदाहरण मिलते हैं। भारत में व्यक्ति-पूजा की संस्कृति और राजनीतिक संदर्भों के बीच बुनियादी ढांचे के नामकरण की यह प्रवृत्ति लगातार बहस का विषय बनी हुई है।

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