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तमिलनाडु के बटलागुंडू में नवनितम ‘नावी’ पिल्लै के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने पर जश्न

तमिलनाडु के बटलागुंडू में नवनितम 'नावी' पिल्लै के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने पर जश्न

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश और मानवाधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाली नवनितम ‘नावी’ पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद उनके पैतृक गांव बटलागुंडू में जश्न का माहौल है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के अभियोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना है। इस वैश्विक मान्यता के बाद उनके रिश्तेदारों में भारी उत्साह है और वे उनकी भारत यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

पैतृक जड़ों से जुड़ाव और पुरानी यादें

नावी पिल्लै का अपने पैतृक गांव से जुड़ाव काफी पुराना और भावनात्मक रहा है। उनके एक करीबी रिश्तेदार एम. वेंकटेश कुमार ने बताया कि पिल्लै ने सबसे पहले 1970 में इस गांव का दौरा किया था और बाद में 2007 में अपने दिवंगत पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए वह फिर यहां आईं। उनके पिता का दक्षिण अफ्रीका में निधन हो गया था और उनकी इच्छा थी कि उनकी अस्थियां रामेश्वरम में विसर्जित की जाएं तथा परिवार अपने पैतृक देवता के मंदिर जाए। उस समय पिल्लै के पास उनके दादा की एक पुरानी तस्वीर और एक अस्पष्ट पता था, जिसके सहारे उन्होंने अपने परिवार की तलाश की थी।

चाय की दुकान पर मिली थी सफलता

स्थानीय निवासियों और अधिकारियों की मदद से उनकी तलाश उस समय सफल हुई जब एक स्थानीय चाय की दुकान पर एक राहगीर ने पुरानी तस्वीर में उनके दादा को पहचान लिया। इसके बाद स्थानीय प्रशासन और लोगों की मदद से वह अपने पैतृक घर पहुंचीं और अपने रिश्तेदारों से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने परिवार के साथ समय बिताया और अपने पैतृक घर की हर जानकारी हासिल की।

परिवार और गांव में जश्न का माहौल

नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर मिलते ही बटलागुंडू में उनके रिश्तेदारों ने केक काटकर इस खुशी को मनाया। परिवार का कहना है कि वह केवल एक प्रसिद्ध न्यायविद् ही नहीं बल्कि उनके खून का रिश्ता रखने वाली परिजन हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस बार उन्हें अपनों तक पहुंचने के लिए किसी पुरानी तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि पूरा गांव उनका स्वागत करने के लिए तैयार बैठा है।

दक्षिण अफ्रीका के डरबन में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के दौर में संघर्ष करते हुए मानवाधिकारों और समानता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने इस सम्मान को अंतरराष्ट्रीय अपराधों के बचे हुए पीड़ितों और न्याय के लिए लड़ने वालों को समर्पित किया।

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