युद्ध और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में अक्सर यह मान लिया जाता है कि प्रकृति का संरक्षण जरूरी तो है, लेकिन इसकी तत्काल कोई अनिवार्यता नहीं है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह सोच बेहद घातक साबित हो सकती है। आगामी सम्मेलनों से पहले यह याद रखना आवश्यक है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव जीवन का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर प्राकृतिक प्रणालियों पर टिका हुआ है।
अर्थव्यवस्था और आजीविका की रीढ़ है प्रकृति
दुनिया की आधी से अधिक जीडीपी प्रकृति और उससे मिलने वाली सेवाओं पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, एक बड़ी फूड इंडस्ट्री गुणवत्तापूर्ण मिट्टी पर टिकी है, जबकि करोड़ों लोगों की आजीविका वनों से जुड़ी हुई है। नदियां बाढ़ के पानी को नियंत्रित कर परिवहन नेटवर्क को बनाए रखने में मदद करती हैं। ऐसे में, यदि पर्यावरण से जुड़े सवालों को युद्ध समाप्त होने तक टाला जाएगा, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हाल के वर्षों में चरम-मौसम की घटनाओं और संघर्षों के मिले-जुले असर ने वैश्विक खाद्य कीमतों और कृषि उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
’30 बाय 30′ लक्ष्य और वर्तमान प्रगति
पर्यावरण और जैव विविधता को बचाने के लिए ’30 बाय 30′ की पहल आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इस लक्ष्य के तहत वर्ष 2030 तक दुनिया की कम से कम 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्र की रक्षा करने का संकल्प लिया गया है। पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन महासागरों के संरक्षण के मामले में रफ्तार अभी भी काफी धीमी है। समुद्री क्षेत्रों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही प्रभावी रूप से संरक्षित माना गया है।
वित्तीय सहायता बढ़ाने की सख्त जरूरत
इस दशक के इस अहम लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब केवल कुछ ही साल बचे हैं। निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सरकारों को प्रकृति संरक्षण के वास्ते वित्तीय सहायता में भारी वृद्धि करने की आवश्यकता है। वर्तमान में इस क्षेत्र में खर्च की जा रही राशि जरूरत की तुलना में काफी कम है। पर्यावरण संरक्षण पर होने वाले खर्च को मात्र लागत नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता और मानव जीवन की सुरक्षा के लिए एक आवश्यक निवेश है।

