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ईश्वर से ऐसी भक्ति का वरदान मांगें जो तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ हो

ईश्वर से ऐसी भक्ति का वरदान मांगें जो तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ हो

जीवन में ईश्वर से प्रार्थना करते समय हमें ऐसी सर्वोच्च भक्ति का वरदान मांगना चाहिए, जो बड़े-बड़े साधु-संतों और तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ होती है। जब कोई आराधक पूरी समझदारी और चतुराई के साथ परमात्मा से केवल उनकी सच्ची भक्ति मांगता है, तो ईश्वर भी उसकी इस भावना से अत्यधिक प्रसन्न हो जाते हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए इस प्रकार का दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।

काकभुशुंडि और श्रीराम का प्रसंग

कथानुसार एक बार काकभुशुंडि जी के सामने श्रीराम जी स्वयं खड़े थे और उन्होंने अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी मांगने को कहा था। तब काकभुशुंडि जी ने श्रीराम जी से वह दुर्लभ भक्ति मांगी, जो बड़े-बड़े साधु-संतों को भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती है। इस प्रसंग में उनकी ऐसी मांग देखकर श्रीराम जी को स्वयं कहना पड़ा कि उन्होंने उनकी चतुराई को देखकर रीझकर ऐसी भक्ति दी जो उन्हें अति प्रिय लगी।

आम तौर पर मनुष्य संसार के सामने अपनी चतुराई दिखाने का प्रयास करता है, लेकिन जब कभी भी भगवान के सामने अपनी चतुराई दिखाने का अवसर मिले, तो उनसे वही भक्ति मांगनी चाहिए जो सामान्य तपस्वियों को भी प्राप्त न हो सके। इस प्रकार की मांग करने पर भगवान यह भली-भांति समझ जाते हैं कि उनका भक्त पूरी तरह समझदार है और वह दुनियादारी की चीजों के बजाय वास्तव में उनसे केवल भक्ति ही प्राप्त करने आया है।

बुद्धि और चतुराई का सही उपयोग

विज्ञान के अनुसार हमारे मस्तिष्क का एक बहुत बड़ा हिस्सा सेरिब्रम के रूप में मौजूद होता है, जिसके भीतर हमारी बुद्धि और चतुराई दोनों निवास करती हैं। हमारी बुद्धि का वास्तविक जीवन में किस प्रकार उपयोग किया जाना चाहिए, इसका सही संकेत हमारी चतुराई ही प्रदान करती है। इसलिए अपनी बौद्धिक क्षमता और चतुराई का सही दिशा में प्रयोग करना आवश्यक होता है।

ध्यान और कल्पना का अभ्यास

दैनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच यदि हम थोड़ा समय निकालें, तो आत्म-चिंतन और मानसिक संतुलन बेहतर हो सकता है। कम से कम चौबीस घंटे के भीतर दो बार अपनी आंखें बंद करके यह कल्पना करनी चाहिए कि ईश्वर हमारे ठीक सामने खड़े हैं। ऐसे पावन क्षणों में हमें भगवान से कुछ ऐसा मांगना चाहिए जिससे हमारी सच्ची चतुराई और समझदारी की प्रशंसा स्वयं ईश्वर भी करें।

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