दशकों से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के चिकन नेक को लेकर देश की सुरक्षा पर होने वाली चर्चाएं विभिन्न अंदेशों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं, लेकिन अब खतरों की प्रकृति में बड़ा बदलाव आ चुका है। हाइब्रिड संघर्षों के इस दौर में किसी भी विरोधी के लिए इस कॉरिडोर पर सीधा कब्जा करना या उसे भौतिक रूप से क्षति पहुंचाना आवश्यक नहीं रह गया है, बल्कि मामूली व्यवधान पैदा करना भी सामरिक असर दिखा सकता है। भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाली तमाम महत्वपूर्ण परिवहन लाइनें, ऊर्जा पाइपलाइनें और संचार तंत्र इसी संकरे भूगोल से होकर गुजरते हैं।
बदलते खतरे और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां
भौगोलिक रूप से नेपाल और बांग्लादेश के बीच इस कॉरिडोर का सबसे संकरा हिस्सा मात्र 20 से 22 किलोमीटर का ही है। इस क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में भूटान और उससे आगे सिक्किम, चुम्बी घाटी तथा डोकलाम स्थित हैं। साल 2017 में डोकलाम में हुए टकराव से यह स्पष्ट हो चुका है कि इस क्षेत्र के घटनाक्रम भारत के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। हालांकि कड़े भूभाग और मजबूत सैन्य तैनाती के कारण इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण आसान नहीं है, फिर भी तात्कालिक चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। किसी बड़े टकराव के दौरान रेलवे पुलों को निष्क्रिय करना, दूरसंचार सेवाओं में बाधा डालना या सुनियोजित तोड़फोड़ करना बड़े रणनीतिक प्रभाव छोड़ सकता है।
गैर-सैन्य नेटवर्क और स्थानीय सुरक्षा का दायरा
पारंपरिक सैन्य कार्रवाई के मुकाबले आज बड़ी चिंता इस बात की है कि शत्रुतापूर्ण ताकतें स्थानीय कमजोरियों या नेटवर्क का फायदा उठा सकती हैं। तस्करी के नेटवर्क, जाली दस्तावेज और अवैध आवाजाही शांति के समय भले ही कानून व्यवस्था का मामला दिखें, लेकिन संकट के समय इनका उपयोग हथियारों या अवांछित तत्वों को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। बिहार के सीमावर्ती जिले जैसे किशनगंज, अररिया और पूर्णिया भी इस व्यापक आवागमन क्षेत्र का हिस्सा हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सामरिक गहराई आसपास के क्षेत्रों तक फैली हुई है। इसलिए खुफिया तंत्रों का आपसी समन्वय और पुलिस की सतर्कता इस पूरे भूभाग को सुरक्षित रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

