सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे दीपोत्सव के अवसर पर आतिशबाजी करने के बजाय पारंपरिक रूप से दीये जलाने की पुरानी संस्कृति की ओर लौटें। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बेहतर और स्थायी मार्ग यही है कि लोगों की अंतरात्मा को जागृत किया जाए और उन्हें स्वच्छ तथा स्वैच्छिक प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोगों को समझदार बनाना और उन्हें यह बताना सबसे अच्छा तरीका है कि कौन सी चीजें हानिकारक हैं और कौन सी कम नुकसानदेह हैं। पीठ ने जोर दिया कि लोगों को हमारी मूल संस्कृति के अनुसार दीये जलाने के लिए राजी किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान एम्स और प्रदूषण से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों पर भी चर्चा की गई। न्याय मित्र के रूप में अदालत की सहायता कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का जिक्र किया। अदालत ने यह भी माना कि प्रतिबंधात्मक आदेशों को अक्सर एक दबाव के रूप में देखा जाता है, इसलिए लोगों को स्वेच्छा से आगे आना चाहिए।
अदालत ने अधिकारियों से अपील की है कि वे लोगों को कम से कम और निर्धारित घंटों के भीतर ही पटाखे चलाने के लिए जागरूक करें ताकि ध्वनि और वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। इसके अलावा, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण, पराली जलाने और ठोस कचरे के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर भी सुनवाई की जा रही है, जिस पर अगली सुनवाई की तारीख तय की गई है।

