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पश्चिम बंगाल की आदिवासी महिला ने स्कूल खोलकर छोड़े गए बच्चों को दी नई राह

पश्चिम बंगाल की आदिवासी महिला ने स्कूल खोलकर छोड़े गए बच्चों को दी नई राह

पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्द्धमान जिले के आसनसोल स्थित पलाशडीहा की रहने वाली संजाली सोरेन ने अपनी तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए अन्य बच्चों के जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैलाने का बीड़ा उठाया है। वित्तीय तंगी के कारण एक समय पर उन्हें भी पढ़ाई छोड़कर बाल श्रम करने को मजबूर होना पड़ा था, लेकिन आज वह कई बच्चों के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं। स्थानीय बच्चे उन्हें प्यार से ‘संजाली दीदीमुनि’ कहकर पुकारते हैं।

कठिन परिस्थितियों से लड़कर आगे बढ़ीं संजाली

संजाली का परिवार अत्यधिक आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उनके पिता की तबीयत खराब रहती थी और मां लोगों के घरों में घरेलू सहायिका के रूप में काम करती थीं। इस स्थिति के चलते उन्हें स्कूल छोड़कर ईंट भट्टों और स्टोन क्रशर जैसी जगहों पर मजदूरी करने के लिए विवश होना पड़ा था। ऐसे मुश्किल समय में आसनसोल के एक सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर कुंडू ने उनकी मदद की। उन्होंने संजाली को अपने घर में आश्रय दिया और भोजन, कपड़े, किताबें तथा स्कूल बैग जैसी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए दोबारा पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रेरित किया। इन प्रयासों के बल पर संजाली ने अपनी उच्च माध्यमिक परीक्षा सफलतापूर्वक पास की और आगे की पढ़ाई जारी रखी है।

बच्चों को मातृभाषा में दे रही हैं शिक्षा

खुद शिक्षा के क्षेत्र में तमाम बाधाओं का सामना करने के बाद संजाली ने कतागारिया इलाके में उन बच्चों के लिए एक छोटा सा अध्ययन केंद्र स्थापित किया है, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। चूंकि ये बच्चे हाशिए पर रहने वाले परिवारों से आते हैं और उनके माता-पिता दैनिक वेतन भोगी मजदूर हैं, इसलिए वे अक्सर स्कूल नहीं जा पाते हैं। संजाली इन बच्चों को उनकी अपनी आदिवासी यानी संथाली भाषा में पढ़ाती हैं, जिससे बच्चों का उत्साह बढ़ता है और वे पढ़ाई के प्रति अधिक रुचि दिखाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर कुंडू और शुभचिंतकों के सहयोग से स्थापित यह स्कूल आज कई बच्चों के भविष्य को संवारने का काम कर रहा है।

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