अमेरिका और इजराइल कथित तौर पर नवंबर की शुरुआत में ईरान पर नए सिरे से हमले करने की योजना बना रहे हैं। हालांकि ईरानी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया जा चुका है और नौसैनिक नाकेबंदी भी की गई है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका ईरान से अपनी मांगें मनवाने में सफल नहीं हो पाया है। इस स्थिति के चलते मध्य-पूर्व में व्यापक तबाही और वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रभावित होने का बड़ा जोखिम बना हुआ है।
सैनिक जमावड़ा और संभावित हमले के लक्ष्य
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस योजना पर चर्चा के लिए हाल ही में बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की थी, और अमेरिका ने इसके लिए बड़ी सेना भी जुटा ली है। हालांकि इस कदम के लिए अमेरिकी स्वीकृति जरूरी है, जिसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। नए हमलों में ईरान के ऊर्जा ढांचे, परमाणु ठिकानों, ड्रोन और मिसाइल भंडारों को निशाना बनाया जा सकता है। अमेरिकी रणनीतिकारों को उम्मीद है कि इस बड़े हमले से ईरान परमाणु कार्यक्रम के मसले पर उनकी शर्तें मानने को मजबूर हो जाएगा।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और क्षेत्रीय जोखिम
दूसरी ओर, ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय स्तर पर अमेरिकी ठिकानों, युद्धपोतों और खाड़ी देशों के ऊर्जा ढांचे, हवाई अड्डों व तेल पाइपलाइनों को आक्रामक तरीके से निशाना बनाएगा। ईरानी बलों के पास अभी भी हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं। इसके अलावा, हाल ही में ईरान द्वारा इंटरनेट केबलों को नुकसान पहुंचाने की चेतावनी भी दी गई है, जिससे खाड़ी देशों में कनेक्टिविटी ब्लैकआउट होने और भारत समेत कई क्षेत्रों में डिजिटल तथा वित्तीय नेटवर्क के बाधित होने की आशंका जताई जा रही है।
राजनीतिक बदलाव और भविष्य की अनिश्चितता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संघर्ष की तस्वीर आगामी राजनीतिक परिणामों पर भी निर्भर करेगी। इजराइल के चुनावों में बेंजामिन नेतन्याहू की हार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, और अमेरिका में 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों में संभावित झटकों से राजनीतिक नेतृत्व कमजोर पड़ सकता है। यदि कोई ठोस कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो सैन्य कार्रवाई से संघर्ष सुलझने के बजाय और अधिक गहरा सकता है।

