रुपए के मूल्य में उतार-चढ़ाव के दौरान देश की नीतिगत प्रतिक्रिया अक्सर अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं को दूर करने के बजाय पूंजी प्रवाह को संभालने पर केंद्रित रही है। विदेशी मुद्रा अनिवासी डिपॉजिट जैसी योजनाएं कुछ समय के लिए राहत तो दे सकती हैं, लेकिन इनसे मिलने वाला लाभ केवल अस्थायी होता है। इस स्थिति से निपटने के लिए सबसे प्रभावी समाधान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करना और अपने निर्यात को मजबूत करना है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विनियामक स्पष्टता
वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों ने भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया है। भारत में भी विदेशी निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि शासन के सभी स्तरों पर नियम स्पष्ट हों और अपेक्षित परिणाम सुनिश्चित किए जाएं। आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बिक्री जैसी पहलों से वित्तीय क्षेत्र में बाजार का भरोसा मजबूत हुआ है। हालांकि, न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर आने वाली अनिश्चितताएं कई बार निवेशकों के उत्साह को प्रभावित करती हैं। कर विवादों में बड़ी मात्रा में धन फंसा होना और अदालती फैसलों में असमंजस की स्थिति निवेशकों के जोखिम को बढ़ा देती है।
निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार
निवेशकों का विश्वास बहाल करने और विदेशी पूंजी को बढ़ावा देने के लिए देश को विनिर्माण क्षेत्र में नई कंपनियों को आकर्षित करना होगा। स्मार्टफोन निर्माण के क्षेत्र में किए गए प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया है, जिससे यह आज देश की प्रमुख निर्यात श्रेणी बन चुका है। इसी प्रकार, डेटा सेंटर और अन्य आवश्यक घटकों के लिए भी आयात पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है ताकि आत्मनिर्भरता और निर्यात दोनों को एक साथ गति मिल सके।

