नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने सुप्रीम कोर्ट को एक हलफनामे के जरिए स्पष्ट किया है कि यूपीआई के संशोधित मूल्य निर्धारण ढांचे के तहत व्यापारी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क का बोझ सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल सकते हैं। अदालत में यह जानकारी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दी गई, जिसमें कुछ खास यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में एनपीसीआई का हलफनामा
शीर्ष अदालत में दाखिल किए गए हलफनामे में एनपीसीआई ने बताया कि यूपीआई एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स उपयोगकर्ताओं से किसी भी प्रकार का प्लेटफॉर्म शुल्क या अतिरिक्त चार्ज नहीं वसूल सकते हैं। अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए संशोधित ढांचे पर फिलहाल कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह पूरा मामला भुगतान प्रणालियों से जुड़े अधिनियमों और वित्त मंत्रालय की अधिसूचनाओं से जुड़ा हुआ है।
किसे और कहां देना होगा एमडीआर शुल्क?
नई व्यवस्था के अनुसार, दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा ‘पर्सन-टू-मर्चेंट’ (P2M) लेन-देन पर ही 0.4 प्रतिशत तक का एमडीआर लागू होता है। एनपीसीआई का कहना है कि यह शुल्क केवल एक बहुत छोटे हिस्से पर लगता है, इसलिए व्यापारियों के पास अपने सभी ग्राहकों के लिए कीमतें बढ़ाने का कोई उचित आधार नहीं है। इसके अलावा, आम लोगों के बीच होने वाले ‘पर्सन-टू-पर्सन’ (P2P) ट्रांसफर और जीरो-एमडीआर के दायरे में आने वाले छोटे व्यापारी इस शुल्क से पूरी तरह मुक्त रहेंगे।
नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई
संशोधित ढांचे का बचाव करते हुए कॉरपोरेशन ने स्पष्ट किया कि एमडीआर चार्ज को ग्राहकों पर स्थानांतरित करने से रोकना एक सख्त निर्देश है, जिसे कानूनी अनुबंधों के माध्यम से लागू किया गया है। यदि नियमों का कोई उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित बैंकों, पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स और थर्ड पार्टी एप्लिकेशन प्रोवाइडर्स के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे, जिसमें उनकी सदस्यता को समाप्त करना भी शामिल है।

