केंद्रीय सरकार ने सिक्किम के सोरेंग में देश के पहले जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर के प्रमाणीकरण के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी कर दी है। इस नई पहल का मुख्य उद्देश्य जैविक तरीकों से पाली गई मछलियों के लिए बेहतर मूल्य वाले बाजारों तक पहुंच बनाना है। पारंपरिक रूप से जैविक खेती का मतलब फल, अनाज और सब्जियों तक सीमित समझा जाता था, लेकिन अब इस दिशा में मछली पालन को भी शामिल किया जा रहा है।
तालाब चयन और पानी की गुणवत्ता के कड़े नियम
जैविक मछली पालन के लिए केवल साफ पानी या रसायन मुक्त तालाब होना ही काफी नहीं माना गया है। इसके लिए ऐसे तालाबों का चयन करना जरूरी होगा जहां आसपास के उद्योगों, नालों या खेतों का प्रदूषित पानी या रसायन न पहुंच सकें। इसके अलावा, तालाब के पानी में घुली ऑक्सीजन, तापमान और अमोनिया के स्तर की नियमित जांच करना अनिवार्य किया गया है। तालाब की सफाई और कीटाणु नियंत्रण के लिए भी केवल स्वीकृत जैविक पदार्थों का ही उपयोग किया जा सकेगा।
बीज, चारा और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े प्रावधान
मछली पालकों को प्रमाणित जैविक स्रोतों से ही बीज लेने होंगे और स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देनी होगी। आनुवांशिक रूप से बदले गए बीज पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे। एसओपी के मुताबिक, एक हेक्टेयर क्षेत्र में अधिकतम चार हजार फिंगरलिंग और किसी भी समय तीन टन से अधिक मछली बायोमास नहीं रखा जा सकता है। अतिरिक्त भोजन के रूप में केवल प्रमाणित जैविक फीड या जैविक स्रोतों से तैयार चारे का ही इस्तेमाल किया जा सकेगा, जबकि सिंथेटिक अमीनो एसिड और ग्रोथ प्रमोटर के प्रयोग पर पूरी तरह रोक होगी।
बीमारी की रोकथाम और प्रमाणीकरण की अनिवार्यता
मछलियों में बीमारियों की रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक और हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। आवश्यकता पड़ने पर तय मानकों के अनुसार केवल हर्बल या होम्योपैथिक दवाओं का ही उपयोग किया जा सकेगा। इसके अलावा, किसी भी दावे के आधार पर मछली को जैविक नहीं माना जाएगा, बल्कि पूरी जांच और उत्पादन का रिकॉर्ड रखने के बाद ही प्रमाणपत्र प्रदान किया जाएगा। किसानों के सामने मुख्य रूप से जैविक चारा उपलब्ध कराने, प्रमाणन की लागत को नियंत्रित करने और सामान्य मछलियों की तुलना में बेहतर कीमत प्राप्त करने की चुनौती होगी।

