अमेरिका के हालिया मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर नियंत्रण हासिल करने और सीनेट में बढ़त दर्ज करने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हुई है। इस राजनीतिक बदलाव का भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर सीधा असर भले ही न पड़े, लेकिन व्यापार, एच-1बी वीजा और टैरिफ जैसे मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन पर निगरानी बढ़ने से भारत को परोक्ष लाभ मिल सकता है।
व्यापार और टैरिफ नीतियों पर असर
व्यापार और शुल्क के मामलों में ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अब अमेरिकी संसद की पैनी नजर रहने की संभावना है। डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाले हाउस द्वारा इन नीतियों की जांच किए जाने और राष्ट्रपति की टैरिफ लगाने की शक्तियों को सीमित करने के प्रयास किए जा सकते हैं। इससे भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में अधिक अनुकूल सौदेबाजी की स्थिति मिलने की उम्मीद है, हालांकि राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां अभी भी बरकरार हैं।
आईटी पेशेवरों और एच-1बी वीजा को लेकर राहत
अमेरिकी संसद के नए समीकरण का असर एच-1बी वीजा और आव्रजन नीतियों पर भी पड़ सकता है। पिछले कुछ समय में एच-1बी आवेदनों पर लगाई गई भारी फीस और राष्ट्रवादी नीतियों के कारण भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के सामने मुश्किलें खड़ी हुई थीं। भारतीय पेशेवर कुल एच-1बी स्वीकृतियों का एक बड़ा हिस्सा हैं, और नई कांग्रेस इस तरह की शुल्कों को विधायी रूप देने के प्रयासों पर रोक लगा सकती है।
रक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर निरंतरता
रक्षा, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक सहयोग के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध बने रहने की उम्मीद है। चीन को संतुलित करने की रणनीति, क्वाड सहयोग और सेमीकंडक्टर व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों का व्यापक समर्थन प्राप्त है। इसलिए इन सामरिक मुद्दों पर मिडटर्म चुनावों के परिणामों का कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
ऊर्जा और प्रतिबंधों से जुड़ी नई चुनौतियां
रूस और ईरान से ऊर्जा खरीदने के मामलों में डेमोक्रेटिक नियंत्रित कांग्रेस का रुख अधिक कड़ा हो सकता है। डेमोक्रेट्स पारंपरिक रूप से रूस के खिलाफ सख्त नीतियों के समर्थक रहे हैं, जिससे भारत के ऊर्जा और रक्षा संतुलन पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत सरकार को कूटनीति के स्तर पर संभलकर कदम उठाने होंगे।

