अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को मिली हार के बाद भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। देश के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने इस स्थिति पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा है कि इस चुनावी झटके से भारत के प्रति अमेरिकी रवैये में तुरंत कोई भारी बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे वीजा नीतियों या मुक्त व्यापार समझौतों पर तत्काल कोई असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।
वीजा और व्यापार नीतियों पर क्या होगा असर?
पूर्व राजनयिक का मानना है कि अमेरिका की वीजा और इमिग्रेशन नीतियों में दोनों ही प्रमुख दलों के बीच एक प्रकार की आम सहमति रही है। एच1बी1 वीजा और सख्त होती इमिग्रेशन नीतियों का आधार अमेरिकी समाज की अपनी भावनाएं और घरेलू चिंताएं हैं। इसलिए यह उम्मीद करना उचित नहीं होगा कि राजनीतिक बदलाव के बाद अचानक से उदार व्यापार व्यवस्था या आसान वीजा नीतियां बहाल हो जाएंगी। अमेरिका के भीतर लंबे समय से सुरक्षा और संरक्षणवादी दृष्टिकोण को लेकर द्विदलीय सहमति बनी हुई है।
भारत को क्या रणनीति अपनानी चाहिए?
श्याम सरन ने सलाह दी है कि भारत को इस राजनीतिक घटनाक्रम पर बहुत अधिक उत्साहित होने के बजाय संयम बरतना चाहिए। भारत की विदेश नीति हमेशा से सामरिक स्वायत्तता और बहुसंरेखण के सिद्धांतों पर आधारित रही है। हमें खामोशी के साथ धैर्यपूर्वक अमेरिका के भीतर चल रहे अंदरूनी बदलावों का निरीक्षण करना चाहिए। अमेरिकी विदेश नीति में राष्ट्रपति के पास पर्याप्त कार्यकारी अधिकार होते हैं, और ट्रंप का कार्यकाल अभी बाकी है, जिसके चलते विदेश मामलों में एकतरफा फैसले लेने की गुंजाइश बनी हुई है।
घरेलू और भू-राजनीतिक बदलाव
चुनावी नतीजों का असर अमेरिका की घरेलू नीतियों और कुछ खास फैसलों पर अवश्य पड़ सकता है, जैसे कि ईरान के मामलों या सैन्य कार्रवाइयों को लेकर जनता की प्रतिक्रिया। हालांकि, भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए ही आगे के कदम उठाने चाहिए, ताकि बदलते वैश्विक परिदृश्य में देश के हितों की रक्षा भली-भांति की जा सके।

