उत्तराखंड के B.P.Ed., M.P.Ed. डिग्रीधारक इच्छामृत्यु की गुहार में, 20 सालों से रोजगार के लिए भटक रहे

उत्तराखंड में शारीरिक शिक्षा (Physical Education) में स्नातक (B.P.Ed.) और स्नातकोत्तर (M.P.Ed.) की डिग्री रखने वाले हजारों बेरोजगार युवा पिछले दो दशकों से रोजगार के लिए सरकार और प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। अपनी लगातार अनदेखी और भविष्य को लेकर व्याप्त निराशा के चलते इन युवाओं ने अब महामहिम राष्ट्रपति महोदय को संबोधित करते हुए जिलाधिकारी देहरादून के माध्यम से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगने जैसा अत्यंत गंभीर कदम उठाया है।
उत्तराखंड बी.पी.एड., एम.पी.एड. प्रशिक्षित बेरोजगार संघ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश चंद्र पांडे ने अपने ज्ञापन में कहा है कि वे विगत 20 वर्षों से लगातार अपनी मांगों को लेकर पत्राचार कर रहे हैं, लेकिन सरकार और संबंधित अधिकारियों की उदासीनता उनके भविष्य पर ग्रहण लगा चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को न तो उनकी डिग्रियों की जानकारी है और न ही उत्तराखंड के युवा बेरोजगारों की स्थिति की कोई परवाह।
ज्ञापन में कहा गया है कि बी.पी.एड. और एम.पी.एड. डिग्रीधारकों को कुछ समय पहले तक प्राथमिक शिक्षा के तहत विशिष्ट बीटीसी सहायक अध्यापकों के पदों पर भर्ती किया जाता था, लेकिन 2006 से यह प्रक्रिया बंद कर दी गई है। इससे हजारों शारीरिक शिक्षक बेरोजगार हो गए और उनके लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई।
नई शिक्षा नीति 2020 से इन बेरोजगारों में एक नई उम्मीद जगी थी, क्योंकि इसमें प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय से लेकर इंटरमीडिएट कॉलेजों तक में एक-एक शारीरिक शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य की गई है। इस नीति का उद्देश्य बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही खेलों की जानकारी देना और उनके शारीरिक, मानसिक व सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देना है। हालांकि, बेरोजगारों का आरोप है कि यह नीति भी केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है, और उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए गए।
जगदीश चंद्र पांडे और समस्त बी.पी.एड., एम.पी.एड. प्रशिक्षित बेरोजगारों ने अपने ज्ञापन में कहा है कि निरंतर निराशा और मानसिक उत्पीड़न के कारण वे पूरी तरह से हताश हो चुके हैं, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके परिवारों पर भी पड़ रहा है।
ज्ञापन के अंत में, उन्होंने राष्ट्रपति से मांग की है कि या तो उन्हें जल्द से जल्द रोजगार दिलाकर न्याय प्रदान किया जाए, अन्यथा उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए। इस ज्ञापन की प्रतियां प्रधानमंत्री, राज्यपाल उत्तराखंड और मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार को भी भेजी गई हैं।

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