अल नीनो और कम मानसूनी बारिश से चावल के उत्पादन में भारी कमी की आशंका

अल नीनो और कम मानसूनी बारिश से चावल के उत्पादन में भारी कमी की आशंका

इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव और मानसूनी बारिश की बेरुखी की वजह से देश में धान व चावल की पैदावार में भारी कमी आने की आशंका जताई गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस बार कुल चावल का उत्पादन पिछले सत्र के मुकाबले करीब एक करोड़ टन तक कम रह सकता है। शुरुआत में पानी की कमी के कारण बुवाई का दायरा सिमटा और अब फसल पकने के चरण में नमी घटने से प्रति हेक्टेयर उपज पर भी संकट मंडरा रहा है। इसके अलावा, आने वाले वक्त में अल नीनो के चलते मौसमी परिस्थितियां और अधिक कठिन हो सकती हैं।

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पैदावार पर प्रभाव और सरकारी भंडार

बीते वर्ष देश के भीतर रिकॉर्ड 15.4 करोड़ टन चावल की पैदावार दर्ज की गई थी, जबकि इस बार इसके लगभग 14.4 करोड़ टन रहने की संभावना जताई गई है। पिछले दस वर्षों के दौरान चावल के उत्पादन में दर्ज होने वाली यह सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है। फसल की पैदावार घटने की वजह से घरेलू बाजार में जिंसों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और निर्यात भी महंगा हो सकता है। हालांकि, राहत देने वाली बात यह है कि देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न का सुरक्षित बफर स्टॉक मौजूद है। सितंबर महीने तक विभिन्न राज्यों के पास करीब 5.96 करोड़ टन चावल का सरकारी भंडार उपलब्ध था, जो कि मौजूदा जरूरतों से कहीं अधिक है। इसलिए पैदावार घटने के बावजूद देश की घरेलू आपूर्ति और निर्यात पर फौरी तौर पर कोई गंभीर संकट आने की संभावना नहीं है।

बारिश का आंकड़ा और धान का घटा दायरा

भारत में एक जून से लेकर अब तक मानसूनी वर्षा सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत कम रिकॉर्ड की गई है, जबकि कई मुख्य धान उत्पादक इलाकों में यह कमी 42 प्रतिशत तक जा पहुंची है। इसके साथ ही, 19 सितंबर से पश्चिमी राजस्थान के रास्ते मानसून की वापसी भी शुरू हो चुकी है, जिससे यह स्पष्ट है कि धान के लिए बारिश का मुख्य दौर अब लगभग थम चुका है। वर्षा की इस कमी का बुरा असर केवल पैदावार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेती के कुल क्षेत्रफल पर भी इसका स्पष्ट असर दिखा है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, धान की खेती का रकबा पिछले साल के 445.92 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार 429.28 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। इसका अर्थ है कि लगभग 16.64 लाख हेक्टेयर भूमि पर इस बार धान की रोपाई नहीं हो सकी, जो कि करीब 3.73 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है। चूंकि खरीफ के सीजन में उगाया जाने वाला धान देश के कुल चावल उत्पादन में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा की हिस्सेदारी रखता है, इसलिए रकबे में आई यह गिरावट सीधे तौर पर कुल पैदावार पर बड़ा असर डालती है।

अन्य खरीफ फसलों की स्थिति और जिलावार प्रभाव

कमजोर मानसून की मार केवल धान तक सीमित नहीं रही, बल्कि अन्य प्रमुख खरीफ फसलों का रकबा भी इससे प्रभावित हुआ है। इस बार खरीफ फसलों का समग्र रकबा पिछले साल के 1118.95 लाख हेक्टेयर से घटकर 1103.90 लाख हेक्टेयर रह गया है, यानी इसमें कुल 15 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई है। आंकड़ों के मुताबिक, मक्का के रकबे में 2.23 प्रतिशत और सोयाबीन के रकबे में 0.72 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, तथा मूंग का दायरा भी सिकुड़ा है, हालांकि अरहर और उड़द की बुवाई में कुछ बढ़ोतरी देखने को मिली है। मौसम विभाग यानी आईएमडी के आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल 792 जिलों में से 327 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है। इनमें से 320 जिले ऐसे हैं जहां बारिश की कमी 20 से 59 प्रतिशत के दायरे में दर्ज की गई, जबकि सात जिले ऐसे रहे जहां वर्षा में 60 प्रतिशत से भी अधिक की भारी कमी पाई गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित तमाम राज्यों के विभिन्न जिले इस मानसूनी संकट की चपेट में आए हैं।

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