भारत की इथेनॉल नीति और मक्का किसानों के सामने चुनौतियां

भारत की इथेनॉल नीति और मक्का किसानों के सामने चुनौतियां

तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने आगामी इथेनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए भारी मात्रा में इथेनॉल खरीद के टेंडर जारी किए हैं। इस नई खरीद व्यवस्था के सामने आने के बाद देश की कृषि प्राथमिकताओं, खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक विकास को लेकर कई बुनियादी सवाल खड़े होने लगे हैं। इस ताजा नीति से मक्का किसानों के भविष्य और देश की खाद्य महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

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गन्ने के स्रोतों की अनुपस्थिति और अनाज पर बढ़ता दबाव

जारी किए गए नए टेंडर में गन्ने के रस, चीनी के घोल और बी-हैवी शीरे को पूरी तरह से बाहर रखा गया है। इसके परिणामस्वरूप, इथेनॉल की लगभग पूरी आवश्यकता को अब अनाज आधारित स्रोतों से ही पूरा करना होगा। चूंकि उद्योग जगत की उत्पादन क्षमता मांग से काफी अधिक है, इसलिए कंपनियों के बीच टेंडर हासिल करने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। इस होड़ के चलते कम कीमत वाले विकल्प ज्यादा आकर्षक बन सकते हैं।

टूटे चावल के इस्तेमाल से खाद्य सुरक्षा पर असर

सस्ता इथेनॉल तैयार करने के लिए खराब अनाज और टूटे चावल का उपयोग बढ़ने की उम्मीद है। टूटे चावल से बने इथेनॉल की खरीद कीमत मक्का से बनने वाले इथेनॉल की तुलना में कम है। जानकारों का मानना है कि इससे टूटे चावल की मांग में जबरदस्त इजाफा हो सकता है। चूंकि टूटे चावल का इस्तेमाल पशुओं के चारे और फूड प्रोसेसिंग में भी बड़े पैमाने पर होता है, इसलिए ईंधन और खाद्य श्रृंखला के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

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मक्का किसानों की आजीविका पर संकट

सरकार पिछले कुछ समय से किसानों को धान की खेती छोड़कर मक्का की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, क्योंकि मक्का को इथेनॉल उत्पादन के लिए एक औद्योगिक अनाज के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, नए टेंडर में मक्का से बनने वाले इथेनॉल पर मिलने वाले प्रोत्साहन को कम कर दिया गया है। यदि मक्का आधारित इथेनॉल निर्माताओं पर भी लागत घटाने का दबाव बनता है, तो किसानों को उनकी फसल के कम दाम मिलने की आशंका है। ऐसे में मक्का किसानों के सामने अपनी खेती जारी रखने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

भविष्य की नीतियां और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार

भारत का इथेनॉल कार्यक्रम मूल रूप से कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को मक्का की खेती के लिए व्यावसायिक प्रोत्साहन बनाए रखने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कच्चे माल की खरीद देश की दीर्घकालिक कृषि प्राथमिकताओं के अनुकूल हो।

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