सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पाबंदियों पर सुनवाई, केंद्र सरकार ने स्पष्ट की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट में 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो, ट्रेन सेवाओं और इंटरनेट पर लगाई गई पाबंदियों से जुड़ी अवमानना याचिका पर एक अहम सुनवाई हुई। इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने मीडिया रिपोर्ट्स पर आपत्ति जताते हुए अदालत के सामने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की।

सॉलिसिटर जनरल ने दी कोर्ट रूम की जानकारी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मीडिया और सोशल मीडिया पर यह भ्रामक संदेश फैलाया जा रहा है कि सरकार ने बिना शर्त माफी मांग ली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अवमानना नोटिस के जवाब में दिए जाने वाले हलफनामे के ड्राफ्टिंग नियमों के तहत पहला पैराग्राफ बिना शर्त माफी से शुरू होता है, लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि सरकार ने अपनी कार्रवाई को गलत मान लिया है। सरकार और उसकी एजेंसियों ने जनहित और सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों का पूरी मजबूती से बचाव किया है।
अदालत और अधिकारियों का पक्ष
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष यह मामला आया। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत मीडिया में छपने वाली खबरों के आधार पर काम नहीं करती है और इससे न्यायिक कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ता।
इस मामले में केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) की ओर से अलग-अलग हलफनामे दाखिल किए गए थे:
- गृह सचिव का बयान: गृह सचिव ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए रायसीना हिल के आसपास केवल सेलुलर इंटरनेट सेवाओं को 24 घंटे के लिए अस्थायी रूप से निलंबित किया गया था, जबकि वाई-फाई और ब्रॉडबैंड सेवाएं चालू थीं।
- दिल्ली पुलिस का पक्ष: पुलिस कमिश्नर ने बताया कि पिछले दिनों हुई हिंसा और सुरक्षा के संवेदनशील हालात को देखते हुए एहतियाती कदम उठाए गए थे।
- DMRC की सफाई: DMRC ने स्पष्ट किया कि कुल 303 स्टेशनों में से केवल 45 स्टेशनों पर ही अस्थायी रोक लगाई गई थी और बाकी 258 स्टेशन खुले रहे थे।
अदालत अब मामले के मूल तथ्यों के आधार पर आगे की सुनवाई करेगी।


