ग्रहों की करवट से सत्ता के गलियारों में हलचल के संकेत, 15 सितंबर के बाद बदल सकता है सियासी परिदृश्य: आचार्य दैवज्ञ

देहरादून । सियासत की बिसात पर मोहरे भले ही राजनीतिक गणित से चलते हों, लेकिन ज्योतिष की गणना आने वाले घटनाक्रमों की अपनी अलग तस्वीर पेश करती है। सितंबर 2026 में ग्रहों की बदलती चाल को लेकर उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ‘दैवज्ञ’ ने राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों के संकेत दिए हैं। उनकी गणना के अनुसार 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच सत्ता और प्रशासन के गलियारों में बड़े फेरबदल, अप्रत्याशित घटनाक्रम और राजनीतिक हलचल देखने को मिल सकती है।

 

आचार्य दैवज्ञ के मुताबिक सितंबर में शुक्र, बुध, सूर्य और मंगल जैसे प्रभावशाली ग्रहों का राशि परिवर्तन राजनीतिक सत्ता, प्रशासनिक निर्णयों, जनसंपर्क और कूटनीतिक गतिविधियों पर अपना प्रभाव डाल सकता है। ग्रहों की यह बदलती संरचना जहां प्रशासनिक तंत्र में निर्णयों की गति और कठोरता बढ़ने के संकेत दे रही है, वहीं राजनीति में अंतर्विरोध, बयानबाजी और शक्ति-संतुलन को लेकर नई चर्चाओं का आधार भी तैयार कर सकती है।

—बुध की उच्च स्थिति प्रशासन को दे सकती है निर्णय की धार

आचार्य दैवज्ञ के अनुसार 7 सितंबर को बुध का कन्या राशि में गोचर प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बुध को बुद्धि, तर्क, संवाद, कूटनीति और निर्णय क्षमता का कारक माना जाता है। कन्या राशि में बुध की मजबूत स्थिति के चलते प्रशासनिक मशीनरी में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ने, नीतियों के क्रियान्वयन में तेजी आने और लंबित मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया तेज होने के संकेत हैं। यानी आने वाला समय फाइलों की धूल झाड़ने और फैसलों को जमीन पर उतारने का हो सकता है।

—सूर्य के प्रवेश के साथ सख्त हो सकता है प्रशासनिक रुख

17 सितंबर को सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश को भी आचार्य दैवज्ञ प्रशासनिक दृष्टि से अहम मानते हैं। ज्योतिष में सूर्य को सत्ता, शासन और प्रशासन का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है। ऐसे में सूर्य की स्थिति सरकार के स्तर पर अनुशासन और जवाबदेही को प्राथमिकता देने वाली नीति का संकेत दे सकती है। भ्रष्टाचार, लापरवाही अथवा सरकारी कार्यों में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का रुख और सख्त होने की संभावना जताई गई है।

–18 सितंबर के बाद सियासत में बढ़ सकता है तापमान

राजनीतिक मोर्चे पर सबसे महत्वपूर्ण संकेत 18 सितंबर को मंगल के कर्क राशि में प्रवेश से जुड़े हैं। आचार्य दैवज्ञ के अनुसार मंगल संघर्ष, साहस, आक्रामकता और टकराव का कारक है, जबकि कर्क राशि में मंगल की स्थिति कमजोर मानी जाती है। ऐसे में राजनीतिक दलों के भीतर असंतोष, गुटीय खींचतान और नेताओं के बीच मतभेद उभर सकते हैं। बयानबाजी के तेवर तीखे होने और किसी मुद्दे पर राजनीतिक टकराव गहराने की संभावना भी बन सकती है।

यही वह दौर हो सकता है जब बंद कमरों की राजनीतिक चर्चाएं सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनें और नेतृत्व, संगठन तथा सत्ता-संतुलन को लेकर नई अटकलें जन्म लें।

–शुक्र की मजबूत स्थिति सत्ता पक्ष को दे सकती है कूटनीतिक बढ़त

वहीं 2 सितंबर को शुक्र का तुला राशि में गोचर हो चुका है। आचार्य दैवज्ञ के अनुसार शुक्र कूटनीति, गठबंधन, जनसंपर्क और सामाजिक स्वीकार्यता का कारक है। तुला राशि में शुक्र की मजबूत स्थिति सत्ता पक्ष और नेतृत्वकारी शक्तियों के लिए अनुकूल संकेत दे सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक संवाद को मजबूती मिलने के साथ ही जनता के बीच सरकार की छवि को और प्रभावी बनाने वाली नीतियों अथवा घोषणाओं की संभावना भी बनती है।

–बृहस्पति का प्रभाव बनाए रख सकता है सत्ता संस्थानों की मजबूती

आचार्य दैवज्ञ के अनुसार देवगुरु बृहस्पति की मजबूत स्थिति सत्ताधारी संस्थाओं को वैधानिक और संस्थागत मजबूती प्रदान करने वाली हो सकती है। हालांकि, इसके साथ ही सत्ता और विरोधी गुटों के बीच संवाद की कमी अथवा कुछ मुद्दों पर दूरी बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

—15 सितंबर से 15 अक्टूबर—बदलाव की संभावनाओं का कालखंड

आचार्य दैवज्ञ की गणना का सबसे महत्वपूर्ण संकेत 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच का कालखंड है। इस अवधि में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर ऐसे निर्णय अथवा घटनाक्रम सामने आने की संभावना जताई गई है, जिनका असर तत्काल से आगे तक दिखाई दे सकता है। प्रशासन में कठोर फैसलों और कार्यकुशलता का दबाव बढ़ सकता है, तो राजनीति में समीकरणों, गुटीय संतुलन और नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हो सकती हैं।

कुल मिलाकर ग्रहों की यह चाल प्रशासन के लिए अनुशासन और निर्णय की परीक्षा, जबकि राजनीति के लिए धैर्य, रणनीति और संतुलन की कसौटी लेकर आती दिखाई दे रही है। सितंबर का उत्तरार्ध विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि ग्रहों की गणना जिन संभावनाओं की ओर इशारा कर रही है, सियासत की जमीन पर वह किस रूप में आकार लेती हैं।

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