भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था का विरोधाभास: एक तरफ ओवरट्रीटमेंट तो दूसरी तरफ अंडरट्रीटमेंट
भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि यहाँ एक तरफ ऐसे लोग हैं जिन्हें जरूरत से ज्यादा जांच, दवाइयां और उपचार मिल रहा है, तो दूसरी तरफ करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें बुनियादी चिकित्सा और आवश्यक दवाइयां भी समय पर नहीं मिल पाती हैं। यह स्थिति देश के स्वास्थ्य ढांचे में मौजूद असमानता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

शहरी क्षेत्रों में ओवरट्रीटमेंट की समस्या
बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में यह आम देखा जा सकता है कि हल्की सी थकान या मामूली समस्या लेकर पहुंचने वाले व्यक्ति की भी दर्जनों जांचें करवा ली जाती हैं। रिपोर्ट में जरा सा भी उतार-चढ़ाव दिखने पर नई दवाइयां, सप्लीमेंट्स और अगली जांचों की लंबी सूची थमा दी जाती है। चिकित्सा जगत में यह धारणा बनती जा रही है कि अधिक जांच और अधिक दवाइयों का मतलब बेहतर इलाज है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अंडरट्रीटमेंट
इसके विपरीत, देश के कई गांवों और कस्बों में स्थिति बिल्कुल उलटी है जहाँ लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी आसानी से नहीं मिलतीं। कई लोग वर्षों तक बिना जांच के उच्च रक्तचाप या मधुमेह जैसी समस्याओं के साथ जीते रहते हैं और अस्पताल तब पहुंच पाते हैं जब स्थिति गंभीर हो जाती है। आवश्यक दवाइयों की निरंतर उपलब्धता और नियमित फॉलो-अप का अभाव आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

फास्ट मेडिसिन और स्लो मेडिसिन का संतुलन
चिकित्सा विज्ञान के जानकारों का मानना है कि हर असामान्य संख्या बीमारी नहीं होती और हर समस्या के लिए तुरंत भारी दवाओं की जरूरत नहीं होती। आपात स्थिति या गंभीर मामलों में त्वरित यानी फास्ट मेडिसिन जरूरी है, लेकिन मामूली और बिना लक्षण वाली असामान्यता के लिए जीवनशैली, खानपान और नियमित निगरानी पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।


