केरल की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षिका क्यों बनीं सफाईकर्मी, जानिए पूरी दास्तान
केरल की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षिका केआर ऊषा कुमारी का जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जिन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक दुर्गम जंगलों में रहकर आदिवासी बच्चों को शिक्षित किया। तमाम पुरस्कार मिलने के बावजूद प्रशासनिक बदलावों और अनुबंध आधारित नौकरी की अनिश्चितता के चलते उन्हें अंततः एक सरकारी स्कूल में सफाईकर्मी का पद संभालना पड़ा।

दुर्गम रास्तों को पार कर बच्चों तक पहुंचती थीं शिक्षिका
केआर ऊषा कुमारी तिरुवनंतपुरम जिले के अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व के जंगलों में स्थित कुन्नाथमला गांव के केंद्र में बच्चों को पढ़ाती थीं। वह कक्षा 1 से 4 तक के सभी बच्चों की इकलौती शिक्षिका थीं और गणित, अंग्रेजी, क्षेत्रीय भाषा व पर्यावरण अध्ययन जैसे सभी विषय खुद ही पढ़ाती थीं। स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें रोजाना अपने घर से दोपहिया वाहन, लकड़ी की नाव और फिर घने जंगल व पथरीली पहाड़ियों के बीच 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। अध्यापन के साथ-साथ वे स्कूल का प्रशासनिक कामकाज और बच्चों के लिए मिड-डे मील की व्यवस्था भी खुद ही संभालती थीं। सीमित बजट के बाद भी उन्होंने कभी बच्चों की पढ़ाई या भोजन में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी।
अनुबंध पर रही नौकरी और अनिश्चित भविष्य
आदिवासी बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें एक दर्जन से अधिक राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के बावजूद उन्हें कभी आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल पाई और 20 साल तक पढ़ाने के बाद भी उनकी नौकरी कॉन्ट्रैक्ट पर ही बनी रही। वेतन न मिलने और नौकरी पक्की न होने के विरोध में उन्होंने मार्च 2020 में भूख हड़ताल भी की थी।
स्कूल बंद होने के बाद मिला सफाईकर्मी का पद
मार्च 2022 में केरल सरकार ने छात्रों को बेहतर सुविधाएं देने का हवाला देते हुए राज्य के कई मल्टी ग्रेड लर्निंग सेंटरों को बंद कर दिया, जिससे शिक्षकों का भविष्य अधर में लटक गया। सरकार की पुनर्वास योजना के तहत इन अनुभवी शिक्षकों को सरकारी स्कूलों में सफाईकर्मी के पद पर तैनात कर दिया गया। इसी के चलते ऊषा कुमारी को तिरुवनंतपुरम के एक सरकारी स्कूल में सफाईकर्मी का काम संभालना पड़ा। हालांकि उन्हें इस नए काम से कोई संकोच नहीं है, लेकिन वे आज भी अपने आदिवासी छात्रों को बहुत याद करती हैं और सरकार से मांग करती हैं कि उनकी पेंशन और वरिष्ठता तय करते समय उनके 23 वर्षों के शिक्षण अनुभव को भी शामिल किया जाए।


